मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽङ्कः ४०५
कराकर मैंने बेचारे शकटदास से भी उस कूटपत्र को वैसा न जानते हुए ही लिखवाया था।
राक्षस [ मन में ] भाग्य से शकटदास के प्रति संदेह दूर हो गया।
चाणक्य—अधिक कहने से क्या ( लाभ ), संक्षेप में कह देता हूँ—
हे वीर ! भद्रभट आदि अनुचर, वह उस प्रकार का लेख, वह सिद्धार्थक, वे तीनों आभूषण, आपका मिथ्या मित्र वह बौद्धसंन्यासी, जीर्ण उपवन में मरा हुआ वह पीड़ित मनुष्य और वह सेठ ( चन्दनदास ) का क्लेश—यह सब [ ऐसा आधा कहने पर लज्जा का अभिनय करता है। ] चन्द्रगुप्त का आपके साथ सम्पर्क चाहने वाले मेरी चाल रही है ॥६॥
टिप्पणी—विष्णुगुप्तः अभिवादयते—नामोच्चारणपूर्वक अभिवादन करना शास्त्रसम्मत है। मनु ने कहा है—'अभिवादात्परो विप्रो ज्यायांसमभिवाद-यन् । असौ नामाहमस्मीति स्व नाम परिकीर्तयेद् ॥' कपटलेखम्—कपटः = छलम् अस्ति अस्मिन् इति कपटः = छलमयः कपट + अच् अर्शाआदित्वात् । कपटः लेखः कपटलेखः, तम्। शकटदासः कपटलेखं लिखितवान् = अहं शकटदासम् अजानन्तं कपटलेखं लेखितवान् = मया शकटदासः अजानन् कपटलेखं लेखितः । 'कपटलेखम्' इत्यत्र 'गत्यर्थ'—सूत्रेण कर्मसंज्ञा—द्वितीया । किल—यहाँ मिथ्यार्थक अव्यय है। सर्वम्—अत्र सामान्ये नपुंसकम् । आपको चन्द्रगुप्त के अमात्य-पद पर आरूढ करने के लिए ही मैंने यह सब कुछ किया है। यह निर्वहण नामक अंग है। इस श्लोक में वाक्यार्थहेतुक काव्यलिंग अलंकार है या अर्थान्तरन्यास अलंकार है। इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥६॥
तदेष वृषलस्त्वां द्रष्टुमागच्छति । पश्यैनम् ।
राक्षसः [ स्वगतम् ] का गतिः ? [ प्रकाशम् ] एष पश्यामि ।
[ ततः प्रविशति राजा विभवतश्च परिवारः । ]
राजा—[ स्वगतम् ] विनैव युद्धादार्येण पराजितं दुर्जयं रिपुकुलमिति लज्जित इवास्मि । मम हि—