भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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४०८ मुद्राराक्षसम्

उपमा अलङ्कार और विभावना अलङ्कार मे अङ्गाङ्गिभाव से साङ्कर्य है । इसमें भी मालभारिणी छन्द है ॥ ११ ॥

[ चाणक्यमुपसृत्य ] आर्य ! चन्द्रगुप्त प्रणमति ।

चाणक्य —वृषल ! सम्पन्नास्ते सर्वाशिष । तदभिवादयस्व तत्रभवन्तममात्यराक्षसम्, पैतृकस्तवायममात्यमुख्य ।

राक्षस — [ स्वगतम् ] योजितोऽनेन सम्बन्ध ।

राजा—[ राक्षसमुपसृत्य ] आर्य ! चन्द्रगुप्तोऽहमभिवादये ।

राक्षस [ विलोक्य स्वगतम् ] अये ! अय चन्द्रगुप्त ।। य एष —

बाल एव हि लोकेऽस्मिन् सम्भावितमहोदयः । क्रमेणारुढवान् राज्य यूथैश्वर्यमिव द्विपः ॥ १२ ॥

अन्वय —अस्मिन् लोके सम्भावितमहोदय बाल एव द्विपः यूथैश्वर्यमिव क्रमेण राज्य हि आरूढवान् ॥ १२ ॥

व्याख्या—अस्मिन्—इह, लोके—संसारे, सम्भावितमहोदय —सम्भावितः अनुमित महोदय विशिष्टाभ्युदय यस्य तादृश,, बाल एव—शिशुरेव, द्विप —गज., यूथैश्वर्यमिव—यूथस्य समूहस्य ऐश्वर्यमिव नेतृत्वमिव, क्रमेण—शनै,, राज्य हि—राजपदमेव, आरूढवान्—प्राप्तवान् ॥ १२ ॥

हिन्दी अनुवाद— [ चाणक्य के पास जाकर ] आर्य ! चन्द्रगुप्त प्रणाम करता है ।

चाणक्य—वृषल ! ( मेरे दिये हुए ) तुम्हारे सभी आशीर्वाद पूरे हो गए । इसलिए माननीय अमात्य राक्षस का अभिवादन करो। ये तुम्हारे पितृपरम्परागत प्रधान अमात्य हैं ।

राक्षस—[ मन में ] इसने नाता जोड दिया ।

राजा—[ राक्षस के पास जाकर ] आर्य ! मैं चन्द्रगुप्त प्रणाम करता हूँ ।

राक्षस—[ देखकर मन मे ] अये ! यह चन्द्रगुप्त है ।। जो यह—

इस संसार मे सम्भावना की गई महान् उन्नति वाला बालक ही उसी तरह राज्य को क्रमशः पा गया जैसे हाथी ( का बच्चा हाथियों के ) झुंड के नेतृत्व