मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽङ्कः | ४१९
राक्षस—हे चाणक्य ! ( इसमें ) सन्देह क्यों ?
चाणक्य—अमात्य राक्षस ! बिना शस्त्र धारण किये आप चन्द्रगुप्त पर अनुग्रह कर रहे हैं, इसलिये सन्देह है। अतः यदि सचमुच ही चन्दनदास का जीवन चाहते हैं तो यह शस्त्र धारण कीजिए।
राक्षस—हे चाणक्य ! नही, ऐसा नही। इसके ग्रहण करने में हम अयोग्य हैं, विशेष करके आपके द्वारा ग्रहण किये हुए शस्त्र के (ग्रहण करने में)।
चाणक्य—अमात्य राक्षस ! मैं योग्य हूँ और आप अयोग्य हैं, यह कैसे ? देखिए—
मर्दीले शत्रु के गर्व को चूर करने वाले तथा अत्यन्त पराक्रमी आपके प्रभाव से पलान से रहित न होने वाले और निरन्तर लगाम के धारण करने से क्षीण घोड़ों के साथ नहाने, खाने, घूमने, पीने और सोने के यथेच्छ उपभोगों से वंचित तथा हौदे के सदा कसे रहने से सूजे हुए पृष्ठ भाग वाले इन हाथियों को देखिए ॥१५॥
टिप्पणी—अपि—यहाँ प्रश्नवाचक अव्यय है। अगृहीतशस्त्रेण—अगदत्तायुधेन। यह शस्त्र अमात्य-पद का प्रतीक है। अजस्र—न जस्यति मुञ्चतीति अजस्रम् नञ् √ जस् + र कर्तरि। अजस्रं दत्ता इति अजस्रदत्ता सुप्सुपा स०। स्नानाहारविहारपानशयन—इसमें द्वन्द्व समास है। परिकल्पना—हौदा। व्यतिकर—नित्य सम्पर्क या संलग्नता। वि—अति √ कृ + घ करणे वा अप् भावे = व्यतिकरः। प्रोच्छून—सूजी हुई ( पीठ की हड्डी )। प्र—उद् √ श्वि + क्त कर्तरि। इस श्लोक में तुल्ययोगिता अलंकार है और शार्दूल-विक्रीडित छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥१५॥
अथवा किमनेन न खलु भवतः शस्त्रग्रहणमन्तरेण चन्दनदासस्य जीवितमस्ति।
राक्षसः—[ स्वगतम् ]
नन्दस्नेहकणाः स्पृशन्ति हृदयं भृत्योऽस्मि तद्विद्विषां ये सिक्ताः स्वयमेव पाणिपयसा च्छेद्यास्त एव द्रुमाः ? ।