मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५२ )
जरामध इत्यादि पुरुवंशी राजा राज्य करते रहे थे। बाद में नन्दवंशीय राजाओ ने पुरुवंशी लोगों को निकालकर तथा विजय प्राप्त कर राज्य किया। धीरे-धीरे इनका प्रभाव सम्पूर्ण भारत में व्याप्त हो गया। इसी वंश में महानन्द नामक राजा का जन्म हुआ। यह अत्यन्त पराक्रमी तथा वीर था। इसके दो मन्त्री थे। मुख्य मन्त्री का नाम शकटार तथा दूसरे का राक्षस था। इनमे प्रथम शूद्र वर्ण का तथा दूसरा ब्राह्मण वर्ण का था। दोनो ही महान् प्रतिभाशाली थे। इनमे से शकटार उद्धत था। इसी कारण महानन्द उससे अप्रसन्न हो गये और उसे बन्दी बना दिया।
कुछ समय पश्चात् शकटार छूट गया किन्तु अपने अपमान के कारण उसका मन क्षुब्ध बना रहा। प्रतिहिंसा की भावना उसके हृदय में धधकती रही। एक दिन वह बाहर घूमता हुआ जा रहा था। मार्ग में उसने एक कृष्ण वर्ण के ब्राह्मण को देखा जो कि कुशों की जडो को खोद-खोदकर उसमे मट्ठा डाल रहा था। शकटार वहाँ खडा हो गया तथा उस ब्राह्मण से उसके द्वारा किये जाते हुये कार्य के बारे में पूछने लगा। उसने उत्तर दिया कि मैं विष्णुगुप्त चाणक्य नाम का एक ब्राह्मण हूँ। मैं एक आवश्यक कार्यवश बाहर जा रहा था, मार्ग में ये कुश मेरे पैर में गड गये जिसके कारण मेरा कार्य न हो सका। अत' मैं इन कुशों को समूल नष्ट कर देने के लिये इनकी जडो मे मट्ठा डाल रहा हूँ।
शकटार अपने मन ही मन मे सोचने लगा कि यदि यह ब्राह्मण महानन्द से असन्तुष्ट हो जाय तो मेरे उद्देश्य की सिद्धि हो सकती है। अत वह ऐसे अवसर की प्रतीक्षा करने लगा। महानन्द के यहाँ श्राद्ध होने वाला था। शकटार ने इस श्राद्ध के लिये उस ब्राह्मण को भी निमन्त्रित कर दिया। श्राद्ध के समय वह स्वय कही चला गया क्योकि वह जानता था कि महानन्द काले ब्राह्मण को देख-कर क्रोधित हो जायगा तथा उसे हटा देगा। हुआ भी ऐसा ही। श्राद्ध-भवन में जब राजा ने उस अनिमन्त्रित काले ब्राह्मण को देखा तो उसे अत्यधिक क्रोध आ गया। उसने उसे निकाल देने की आज्ञा दे दी। इस भयंकर अपमान से अपमानित चाणक्य ने वही खडे होकर नन्दवश के विनाश की प्रतिज्ञा की और तत्पश्चात् वहाँ से चला गया।
महानन्द के ८ पुत्र थे तथा एक चन्द्रगुप्त मौर्य नाम का दासी पुत्र भी था।