मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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महानन्द के आठों पुत्र शूद्र होने के कारण उसे घृणा की दृष्टि से देखते थे । वैसे वह अत्यन्त बुद्धिमान् तथा चतुर था । आयु में बड़ा होने के कारण वह अपने को राज्य का अधिकारी समझता था और इसी कारण राज-परिवार से उसका वैमनस्य था । चाणक्य तथा शकटार दोनो ने सलाह की कि राज्य का लोभ देकर उसे अपनी ओर मिला लिया जाय तथा नन्दों का नाश कर देने के पश्चात् उसी को राजा बनाया जाय ।
इसके अनन्तर चाणक्य अपनी कुटी में जाकर रहने लगा । उधर शकटार महानन्द की एक दासी विचक्षणा को तथा चन्द्रगुप्त को अपनी ओर फोड़ने लगा । चाणक्य ने एक ऐसा विषयुक्त पकवान् तैयार कराया कि जिसे खाते ही प्राणान्त हो जाय किन्तु परीक्षा करने पर उसका पता न लगाया जा सके । विचक्षणा ने यह पकवान आठो पुत्रों सहित महानन्द को खिला दिया जिससे सभी का प्राणान्त हो गया । इसके अनन्तर शकटार की मृत्यु हो गयी । चाणक्य चन्द्रगुप्त को राजा बनाने की बात सोचने लगा । उसने पर्वतक नामक राजा को आधा राज्य दे देने का प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला लिया । उसका पुत्र मलयकेतु तथा भाई वैरोधक था । पर्वतक के साथ पाँच म्लेच्छ राजा और थे ।
उधर राक्षस नामक मन्त्री राजा के मर जाने से अत्यन्त दुखी हुआ । उसने उसके सम्बन्धी सर्वार्थसिद्धि को राज-सिंहासन पर बिठालकर राज-कार्य चलाना शुरू किया । किन्तु कुछ समय के पश्चात् सर्वार्थसिद्धि वन को चला गया और वहाँ चाणक्य ने उसे मरवा डाला । ऐसी दशा में राक्षस ने राज्य का प्रलोभन देकर राजा पर्वतक को अपनी ओर मिला लिया तथा चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करने की तैयारी की । चाणक्य को इस बात का पता लग गया । उसने एक विषकन्या पर्वतक के पास भेजी । कामी पर्वतक उसके चक्कर में फँस गया और उसके साथ संसर्ग करते ही उसका देहावसान हो गया । उसका पुत्र मलयकेतु भयभीत होकर भाग गया । इसके अनन्तर राक्षस चन्द्रगुप्त का अनिष्ट करने के लिये पूर्णरूप से उतारू हो गया । इसके पश्चात् मुद्राराक्षस का अपना कथानक प्रारम्भ हो जाता है ।
(२) नन्द नाम के कुछ राजा पूर्वकाल में हो चुके हैं । इनमें सबसे बड़ा राजा 'उग्रधन्वा' था । उसके वक्रनाम आदि चार मन्त्री थे । उनमें सबसे अधिक