भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

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बुद्धिमान् एव चतुर राक्षस नाम का मन्त्री था जो कि राज्य का सञ्चालन करता था। उस राजा की 'सुनन्दा' नाम की पटरानी थी। उसके एक रूपवती दासी भी थी जिसका नाम 'मुरा' था—यह शूद्रा थी किन्तु राजा को अति प्रिय थी। एक बार एक तपस्वी राजा के समीप आये। राजा ने उनकी अच्छी आवभगत की। अभ्यर्थना के अनन्तर उनका चरणोदक रानी तथा मुरा की ओर छिड़क दिया गया। रानी के सिर पर नौ बूँदें तथा मुरा के सिर पर एक बूँद गिरी। बड़ी श्रद्धा एव भक्ति के साथ मुरा ने उसे स्वीकार किया। उसकी भक्ति से तपस्वी अति प्रसन्न हुये। उनके आशीर्वाद से मुरा को एक गुणी पुत्र उत्पन्न हुआ। सुनन्दा के एक साथ नौ पुत्र उत्पन्न हुये। उनका पालन पोषण राक्षस द्वारा किया गया। वे सब बड़े वीर थे। राजा ने उन सभी का नाम 'नन्द' रखा तथा मुरा के पुत्र का नाम चन्द्रगुप्त रखा। नन्द के देहावसान के पश्चात् ये नवौ नन्द राज्याभिषिक्त हुये।

एक बार सिंहल देश के राजा ने एक मोम का सिंह बनवाया तथा उसे पिंजड़े में बन्द कर नन्दों के पास इस संदेश के साथ भेजा कि यदि आपके यहाँ कोई बुद्धिमान् व्यक्ति हो तो पिंजड़े को बिना खोले ही इस सिंह को बाहर निकाल दे। इस सन्देश को श्रवणकर सभी नन्द मौन रह गये। किन्तु चन्द्रगुप्त ने पिंजड़े के चारो ओर आग जलाकर उस सिंह को पिघलाकर बाहर निकाल दिया। सभी आश्चर्य मे पड़ गये। नन्द उससे ईर्ष्या करने लगे तथा उसे देव एवं पितरों के कार्य का पथ्यक बना दिया। चन्द्रगुप्त समय की प्रतीक्षा करता रहा। नन्दों का अपकार करने हेतु वह विष्णुगुप्त नामक एक क्रोधी एव नीतिज्ञ ब्राह्मण के समीप पहुँचा तथा उससे मैत्री भी कर ली।

नन्दो के यहाँ श्राद्ध कर्म मे चन्द्रगुप्त ने उसे निमन्त्रित कर दिया। वह कुरूप था। नन्दों ने उसे देखकर उसे अग्रासन से उठा दिया। इस अपमान से अपमानित उस ब्राह्मण ने अपनी चोटी खोलकर प्रतिज्ञा की कि जब तक मैं नन्दो का समूल नाश नही कर दूंगा तब तक चोटी नही बाधूँगा।

यह कहकर वह नगर से बाहर चला गया। उसके समुचित उपायो द्वारा नन्द का विनाश हो गया और उसकी कृपा से चन्द्रगुप्त मौर्य राजा बना दिया गया। यहीं से 'मुद्राराक्षस' की कथा का प्रारम्भ होता है।