भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 488 में से

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पृष्ठ 58

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अंकानुसार 'मुद्राराक्षस' की संक्षिप्त कथावस्तु

प्रथम अङ्क—भगवान् शंकर की स्तुतिरूप नान्दी के अनन्तर नाटककार प्रस्तावना प्रस्तुत करता है जिसमें सूत्रधार द्वारा सूक्ष्म कवि-परिचय के साथ 'मुद्राराक्षस' के अभिनीत किये जाने की सूचना दर्शकों को दी जाती है। ऐसा कहकर वह अभिनय में भाग लेने हेतु अपनी पत्नी को बुलाने के लिये घर जाता है। वहाँ पहुँचकर वह अपनी पत्नी को चन्द्रग्रहण के उपलक्ष्य में ब्रह्म भोज का आयोजन करने में व्यस्त देखता है। वह अपनी पत्नी से कहता है कि तिथि आदि की दृष्टि से आज चन्द्रग्रहण का होना किसी भी दशा में संभव नहीं है। नेपथ्य से चाणक्य 'चन्द्रग्रहण' शब्द को सुनकर तथा 'चन्द्रगुप्त मौर्य का पकड़ा जाना' अर्थ लेकर कहता है :—

"आः, क एष मयि स्थिते चन्द्रगुप्तमभिभवितुमिच्छति।"

और तदनन्तर रंगमंच पर आकर घोषणा करता है कि "अरे ! वह कौन है कि जो अपनी मृत्यु को स्वयं ही बुला रहा है और कभी की बँध चुकने वाली मेरी चोटी को इस समय भी बँधते हुये नहीं देखना चाहता है।" फिर वह मन ही मन सोचता है—'तपोवन में तपस्या करने के लिये गये हुये सर्वार्थसिद्धि को मरवा दिया गया है। प्रजा में यह समाचार फैला दिया गया है कि राक्षस ने ही विषकन्या को भेजकर पर्वतक को मरवाया है। भागुरायण ने मलयकेतु को यह कहकर भगा दिया है कि तुम्हारे पिता को चाणक्य ने मरवाया है। मन्त्री राक्षस की गतिविधियों पर दृष्टि रखने के निमित्त गुप्तचरों की नियुक्ति की जा चुकी है। अपना सहपाठी विष्णुशर्मा जैन संन्यासी के रूप में कुसुमपुर ( पाटलिपुत्र ) भेजा जा चुका है जो कि राक्षस का विश्वासपात्र बनकर उसके सम्पूर्ण कार्यों का भेद ले रहा है।

नन्दों के प्रति अटूट एवं निश्चल राक्षस की श्रद्धा और भक्ति को देखकर चाणक्य उसे अपनी ओर मिलाकर चन्द्रगुप्त का प्रधान अमात्य बनाने का भी इच्छुक है।

तदनन्तर यम का चित्र हाथ में लिये हुए योगी वेषधारी चाणक्य का गुप्तचर निपुणक चाणक्य को सूचना देता है कि चन्द्रगुप्त के विरोधी तथा राक्षस

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