भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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के परम मित्र तीन व्यक्ति हैं—(१) जीवसिद्धि क्षपणक, (२) शकटदास और (३) सेठ चन्दनदास (जिसने मन्त्री राक्षस के परिवार को अपने घर में शरण दे रखी है।) इतना कहकर वह चाणक्य को राक्षस के नाम से अङ्कित एक मुद्रा देकर चला जाता है ।

एकान्त में बैठकर चाणक्य एक पत्र लिखता है और शकटदास के लेख में उसकी प्रतिलिपि कराने के निमित्त सिद्धार्थक को देता है । सिद्धार्थक शकटदास से प्रतिलिपि कराके ले आता है । इस प्रतिलिपि-पत्र को राक्षस की मुद्रा से मुद्रित कर चाणक्य सिद्धार्थक को देते हुए बतलाता है कि तुम वध-स्थान पर जाकर क्रोधावेश में वधिकों को अपनी आंख का सङ्केत करना । उस संकेत के आधार पर जब वे भाग जायें तब तुम शकटदास को वहाँ से भगाकर राक्षस के समीप ले जाना तथा उसके प्राणों की रक्षा के फलस्वरूप राक्षस से पारितोषिक प्राप्तकर कुछ काल पर्यन्त उसी की सेवा में संलग्न रहना । इसके पश्चात् चाणक्य सिद्धार्थक के कान में कुछ कहकर उसे विदा कर देता है ।

इसके पश्चात् चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रतीहारी द्वारा यह सूचना प्राप्त कर कि महाराज चन्द्रगुप्त राजा पर्वतेश्वर का श्राद्ध करना चाहते हैं और उसमें उनके आभूषणों का दान भी करना चाहते हैं, चाणक्य इस कार्य के निमित्त विश्वावसु आदि तीन ब्राह्मणों की नियुक्ति कर देते हैं ।

इसके अनन्तर चाणक्य अपने शिष्य शाङ्गरव द्वारा कालपाशिक एवं दण्ड-पाशिक के समीप अपने निम्नलिखित दो आदेशों का प्रेषित करता है —

(१) क्षपणक-जीवसिद्धि पर यह आरोप लगाकर नगर से बाहर निकाल दिया जाय कि उसने राक्षस की प्रेरणा से विषकन्या द्वारा पर्वतक को मरवा डाला है ।

(२) शकटदास पर यह दोष लगाकर कि यह प्रतिदिन हमारे विरुद्ध षड्यन्त्र रचा करता है, शूली पर चढ़ा दिया जाय ।

इसके उपरान्त चाणक्य अपने शिष्य द्वारा सेठ चन्दनदास को बुलवाता है और उससे कहता है कि तुमने राक्षस के परिवार को अपने घर में छिपा रखा है । उसे हमको सौंप दो । इसके उत्तर में सेठ चन्दनदास कहता है—राक्षस का