भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 488 में से

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परिवार मेरे घर में नहीं है। यदि रहा होता तो भी मैं आपको नहीं सौंपता ? इसी बीच नेपथ्य में हुये कोलाहल से सूचना मिलती है कि क्षपणक जीवसिद्धि को देशनिकाला दे दिया गया है तथा शकटदास को सूली पर चढ़ाने के लिये ले जाया जा रहा है। चाणक्य चन्दनदास को डरवाते हुये कहता है कि सेठ जी ! आप देख नहीं रहे हैं कि राजा चन्द्रगुप्त राजद्रोहियों के प्रति कितना कठोर हे। अतः तुम राक्षस के परिवार को हमारे हवाले कर दो। जब चन्दनदास इस बात को किसी भी दशा में स्वीकार नहीं करता है तब चाणक्य अपने शिष्य द्वारा विजयपाल से कहलाता है कि सेठ चन्दनदास की सारी सम्पत्ति जब्त कर ली जाय और उसके परिवार को कारागार में डाल दिया जाय।

इसी समय नेपथ्य से यह सूचना मिलती है कि सिद्धार्थक वध-स्थान से शकटदास को भगाकर ले गया है। चाणक्य इसे सुनकर प्रसन्न होता है क्योंकि उसी के आदेश से ऐसा हुआ है। वह जानता है कि सिद्धार्थक जब शकटदास की रक्षा कर राक्षस के समीप उसे ले जायगा तो राक्षस उससे प्रसन्न हो जायेगा और वह राक्षस का विश्वासपात्र भी बन जायगा। ऐसी स्थिति में उसे राक्षस का सम्पूर्ण भेद मिलता रहेगा।

द्वितीय अङ्क—इस अङ्क के प्रारम्भ में जीर्णविष नामक सँपेरा सर्वप्रथम रङ्गमञ्च पर आता है। यह राक्षस का गुप्तचर विराधगुप्त ही है। वह राक्षस से मिलना चाहता है।

इसके पश्चात् अपने भवन में पलँग पर आसीन चिन्तानिमग्न राक्षस दृष्टिगोचर होता है। उसकी चिन्ता का विषय है—दिवंगत स्वामी नन्द को प्रसन्न करना। लक्ष्मी को बुरा-भला कहने के पश्चात् वह सोचता है कि चन्दनदास के घर में अपने परिवार को छोड़कर मैंने उचित ही किया है। चन्द्रगुप्त को मरवाने तथा शत्रुपक्ष के लोगों को फोड़ने के निमित्त मैंने शकटदास को नियुक्त किया है। शत्रु के समाचार जानने हेतु जीवसिद्धि को रख रखा है। इसी समय मलयकेतु द्वारा प्रेषित कंचुकी जाजलि राक्षस के समीप आता है तथा मलयकेतु के अपने शरीर से उतारकर दिये गये आभूषण को राक्षस को पहनाकर चला जाता है।

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