भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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कर सके । इस पर चाणक्य अत्यधिक क्रुद्ध हो जाता है और कहता है कि यदि तुम राक्षस को मुझसे अधिक योग्य समझते हो तो यह शस्त्र मन्त्री राक्षस को ही दे दो। यह कहकर शस्त्र को पृथ्वी पर पटककर चला जाता है।

तदनन्तर चन्द्रगुप्त अपने कंचुकी वैहीनरि को आज्ञा देता है कि राज्य में घोषणा कर दो कि आज से चन्द्रगुप्त ने चाणक्य को मन्त्रि-पद से अलग कर दिया है। वह अपना राज-काज स्वयं देखेगा।

राक्षस का गुप्तचर 'स्तनकलश' इस कृत्रिम कलह को वास्तविक समझता है। कंचुकी भी इस कलह को वास्तविक ही समझता है।

चतुर्थ अङ्क—राक्षस का गुप्तचर करभक पाटलिपुत्र से आता है। वह द्वारपाल से राक्षस से मिलने के निमित्त कहता है। किन्तु रात्रि में देर तक जागने के कारण राक्षस शिरोवेदना से पीड़ित है। अतः द्वारपाल उसे थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के लिये कहता है।

इधर शयनागार में पड़ा हुआ राक्षस सोच रहा है कि सम्पूर्ण रात्रियाँ जागते-जागते ही व्यतीत हो रही हैं। जिस काम को करने की सोचता हूँ वही चाणक्य की कुटिल नीति के कारण विफल हो जाता है। यह राजनीति भी एक विचित्र प्रकार का नाटक है। संभव है कि चाणक्य तथा चन्द्रगुप्त में फूट उत्पन्न हो जाय। अवसर पाकर द्वारपाल करभक के आगमन की सूचना राक्षस को देता है। वह उसे अन्दर बुलवा लेता है। इसी बीच राक्षस की शिरोवेदना का समाचार पाकर मलयकेतु भी भागुरायण के साथ वहाँ जाता है। (यह भागुरायण चाणक्य का गुप्तचर है और मलयकेतु का कपट मित्र। वह आते समय मार्ग में कुछ ऐसी बातें करता रहा था कि जिससे प्रभावित होकर मलयकेतु और राक्षस में फूट पड़ जाय। मार्ग में मलयकेतु ने भागुरायण से पूछा कि भद्रभट इत्यादि ने जो मुझसे यह कहा था कि हम लोग मन्त्री राक्षस द्वारा आपके आश्रय में नहीं आये हैं। हम लोग सेनापति शिखरसेन द्वारा आपके आश्रय में आये हैं—इसका क्या अभिप्राय है? इसके उत्तर में भागुरायण कहता है—राक्षस की शत्रुता चाणक्य से है न कि चन्द्रगुप्त से। यह हो सकता है कि चन्द्रगुप्त चाणक्य को अपने मन्त्री पद से पृथक् कर दे और राक्षस अपने मित्र चन्दनदास की रक्षा के निमित्त चन्द्रगुप्त से सन्धि कर ले। यदि यह बातें

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