मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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सत्य हो जायँ तो आप हम लोगो पर अविश्वास न कर बैठे—इस कारण उनका कथन है कि शिखरसेन द्वारा ही आपके आश्रय मे आये हैं।) किन्तु वे दोनो करभक को राक्षस से पाटलिपुत्र का समाचार बतलाते हुये सुनकर छिप जाते हैं और दोनो का वार्तालाप सुनते हैं। करभक कौमुदी-महोत्सव से सम्बन्धित चाणक्य एव चन्द्रगुप्त की कलह का सम्पूर्ण वृतान्त राक्षस को बतलाता है। तत्कालीन अन्य घटनाओ का भी वर्णन करता है और अन्त मे कहता है कि इसी कलह के परिणामस्वरूप चन्द्रगुप्त ने मन्त्री राक्षस के गुणो की प्रशसा कर चाणक्य को मन्त्रिपद से हटा दिया। चन्द्रगुप्त चाणक्य से इस कारण भी कुपित है कि उसने भागते हुये मलयकेतु और मन्त्री राक्षस की उपेक्षा की। चाणक्य अभी पाटलिपुत्र मे ही है, किन्तु यह शीघ्र ही तपोवन चला जायगा, ऐसा सुना जाता है।
उपर्युक्त समाचार पर राक्षस को विश्वास नही होता है। किन्तु शकटदास उसे समझाता है कि यह बात सम्भव हो सकती है क्योकि प्रतिज्ञा पूरी करने मे किन महान् कष्टो का सामना करना पडता है, यह चाणक्य जानता है। अत अब वह नगर म भी न रहेगा, तपोवन चला जायेगा।
इन सभी बातो का विपरीत अर्थ लगाकर भागुरायण मलयकेतु के मन मे राक्षस के प्रति सन्देह उत्पन्न करने का प्रयत्न करता है और बतलाता है कि राक्षस चन्द्रगुप्त से प्रेम करता है। वह इसी प्रतीक्षा में है कि चाणक्य यदि चला जायगा तो चन्द्रगुप्त का मन्त्री बनकर सारा कार्य करेगा।
इसके पश्चात् राक्षस के आदेश से शकटदास के साथ करभक विश्राम करने चला जाता है तथा मलयकेतु राक्षस के समक्ष उपस्थित होकर उसके सिर-दर्द का हाल पूछता है। राक्षस कहता है कि "जब तक आपको महाराज पद से सुशोभित नही देख लेता हूँ तब तक मेरा सिर-दर्द कैसे ठीक हो सकता है (अर्थात् तब तक मुझे चैन कहाँ ?)" यह सुनकर मलयकेतु पूछता है कि हमको अब कितने दिनों तक आक्रमण के अवसर की प्रतीक्षा करनी होगी ? राक्षस उत्तर देता है कि विलम्ब करने की कोई आवश्यकता नहीं है। शीघ्र ही शत्रु-विजय के निमित्त प्रस्थान किया जाय क्योकि चाणक्य चन्द्रगुप्त से पृथक् हो गया है तथा सचिवायत्तसिद्धि वाला होने के कारण चन्द्रगुप्त के लिये यह एक बडा भारी