मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संकट है। अतः हमारी सफलता को निश्चित ही समझिये। यह सुनकर मलयकेतु अपनी सैन्य-शक्ति की प्रशंसा करता है और तदनन्तर चला जाता है।
तदनन्तर राक्षस आक्रमण के शुभ मुहूर्त्त को जानने के निमित्त ज्योतिषी को बुलवाना चाहता है। उसी समय क्षपणक जीवसिद्धि, जो एक ज्योतिषी भी है, वहाँ आ जाता है। वह मुहूर्त्त बतलाता है कि पूर्णिमा के दिन सूर्यास्त के पश्चात् पूर्ण चन्द्रोदय होने पर, 'बुध' नक्षत्र का योग होने पर तथा केतु के उदय होकर अस्त हो चुकने पर प्रस्थान करना उचित है। राक्षस अन्य ज्योतिषियो से भी परामर्श लेने के लिये क्षपणक से आग्रह करता है। इस पर क्षपणक रुष्ट होकर चला जाता है।
पंचम अङ्क— चाणक्य का गुप्तचर सिद्धार्थक, जो राक्षस की सेवा में रह रहा था, राक्षस से प्राप्त आभूषण के साथ कुसुमपुर के लिये जा रहा है। मार्ग मे उसकी भेंट क्षपणक जीवसिद्धि से हो जाती है। वह सिद्धार्थक को बतलाता है कि तुम भागुरायण से मुद्रा (पारपत्र) प्राप्त किये बिना कुसुमपुर नहीं जा सकते हो। मैं भी मुद्रा-प्राप्ति हेतु भागुरायण के समीप जा रहा हूँ। इस पर सिद्धार्थक कहता है कि मैं तो मन्त्री राक्षस का सेवक हूँ, इस कारण मुझे मुद्रा की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके पश्चात् सिद्धार्थक क्षपणक से कार्य-सिद्धि सम्बन्धी आशीर्वाद चाहता है। क्षपणक आशीर्वाद देता है। फिर दोनों अपने-अपने मार्ग की ओर चल देते हैं।
जिस समय क्षपणक-जीवसिद्धि भागुरायण के समीप पहुँचता है उसी समय मलयकेतु भी भागुरायण से मिलने वहाँ आता है। किन्तु वह भागुरायण के सामने होने से पूर्व भागुरायण एव जीवसिद्धि की परस्पर चल रही बातचीत को छिपकर सुनता है। जीवसिद्धि भागुरायण से कहता है कि मैं राक्षस से बहुत दूर चला जाना चाहता हूँ जिससे कि उसका नाम तक भी मुझे सुनने को प्राप्त न हो। इसका कारण यह है कि मैं कुसुमपुर में रहते समय दुर्भाग्य से राक्षस का मित्र बना और फिर उसके कथनानुसार विषकन्या का प्रयोग कर मैने पर्वतेश्वर की हत्या करवा दी। फलस्वरूप चाणक्य ने मुझे निर्वासित कर दिया। अब भी राक्षस कुछ ऐसा ......रे द्वारा करवाना चाहता है कि जिसके परिणाम स्वरूप मुझे कहीं ......च न कर जाना पड़े।