भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

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राक्षस मलयकेतु के पास जाते समय उन आभूषणों में से एक को धारण कर लेता है कि जिनको उसने क्रय किया था । जब राक्षस मलयकेतु के समीप पहुँच जाता है तब आवश्यक शिष्टाचार के अनन्तर मलयकेतु राक्षस की आक्रमण सम्बन्धी योजना को जानना चाहता है । राक्षस योजना बतलाता है—सबसे आगे वह स्वयं रहेगा, उसके पीछे खश और मगध की सेनाये, मध्य में गान्धार, अन्त में चीन तथा हूणों से युक्त शक राजा लोग और शेष कौलूतादि पाँच राजा मलयकेतु की रक्षा करेंगे । इस योजना को सुनकर मलयकेतु सोचता है कि जो मेरे मारने के लिये नियुक्त हैं वही मेरे रक्षक बनाये जा रहे हैं ।

अब मलयकेतु राक्षस से पुनः पूछता है कि आपने सिद्धार्थक को कुसुमपुर क्यों भेजा है ? इसको भागुरायण और अधिक स्पष्ट करते हुये कहता है कि आपने पत्र, आभूषण तथा मौखिक संदेश देकर सिद्धार्थक को चन्द्रगुप्त के पास क्यो भेजा है ? साथ ही वह पत्र भी उसे पढने को देता है तथा आभूषण भी दिखलाता है और सिद्धार्थक को भी उसके समक्ष उपस्थित करता है । पत्र देखकर राक्षस कहता है कि यह पत्र उसका नहीं है, यह शत्रु का प्रयोग है । हाँ, यह आभूषण सिद्धार्थक को इनाम के रूप में मैंने अवश्य दिया था । इस पर अंकित मुद्रा भी कपट मुद्रा ही है । इतना सुनकर भागुरायण सिद्धार्थक से पूछता है कि यह पत्र किसका लिखा हुआ है ? सिद्धार्थक उत्तर देता है—शकटदास का । राक्षस बडा दुःखी हो जाता है और कहता है कि यदि शकटदास ने लिखा है तो मेरा ही लिखा समझिये । मलयकेतु शकटदास को बुलाना चाहता है किन्तु भागुरायण “कहीं वास्तविकता न खुल जाय—इस भय से” शकटदास को न बुलवाकर उसके लेख की प्रतिलिपि मँगवाता है । प्रतिलिपि उस पत्र से मिल जाती है । अब राक्षस के मन में शकटदास के बारे में सन्देह उत्पन्न हो जाता है । इस बीच मलयकेतु राक्षस के द्वारा धारित आभूषण को देखकर पूछता है कि यह आभूषण तो पिता जी का है ? राक्षस उत्तर देता है कि इसे मैने खरीदा है । अब मलयकेतु को विश्वास हो जाता है कि यह आभूषण चन्द्रगुप्त द्वारा भिजवाये गये तीन आभूषणो में से एक है ।

इसके अनन्तर मलयकेतु राक्षस पर अभियोग लगाता हुआ कहता है कि आपने ही विषकन्या भेजकर मेरे पिता को मरवाया था । इसका प्रमाण जीव-