मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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सिद्धि है। जीवसिद्धि का नाम सुनते ही राक्षस आश्चर्य में पड़ जाता है और सोचता है कि यह भी शत्रु का ही आदमी निकला।
तदनन्तर मलयकेतु शिखरसेन को (जो वस्तुत चाणक्य का ही गुप्तचर है।) आज्ञा देता है कि चित्रवर्मा, पुष्कराक्ष, सिंहनाद सुषेण और मेघनाद—इन पांचों राजाओ को मार डालो। ये पाँचो मार दिय जाते हैं। फिर मलयकेतु राक्षस से कहता है —
“गच्छ, समाश्रीयता सर्वात्मना चन्द्रगुप्त”
अर्थात् जाओ, पूर्णरूप से चन्द्रगुप्त का आश्रय लो। शोक-संतप्त राक्षस चित्रवर्मा आदि राजाओ का वध सुनकर दुःखी होता है तथा अपने परम मित्र चन्दनदास को छुड़ाने के निमित्त चला जाता है।
षष्ठ अङ्क—सिद्धार्थक मलयकेतु के शिविर से लौट आया है तथा उसने वहाँ की पूरी घटना से चाणक्य और चन्द्रगुप्त दोनो को ही अवगत करा दिया है। इसके पश्चात् वह अपने मित्र समिद्धार्थक के समीप गया। मित्र द्वारा पूछे जाने पर सिद्धार्थक कहता है कि चाणक्य के भद्रभट, पुरुषदत्त, हिङ्गरात आदि गुप्तचरों ने मलयकेतु को कैद कर लिया है तथा राक्षस मलयकेतु के शिविर से निकलकर पुनः पाटलिपुत्र में आ गया है। राक्षस के पीछे भी चाणक्य का गुप्तचर उदुम्बर लगा हुआ है। चाणक्य के आदेशानुसार हम दोनो को चन्दनदास को वध्यभूमि मे ले जाकर मार डालना है।
तत्पश्चात् एक पुरुष, जो चाणक्य का गुप्तचर है, राक्षस के समक्ष फांसी लगाने का अभिनय करता है। राक्षस अपने घनिष्ठ मित्र का पता लगाने हेतु पाटलिपुत्र के जीर्ण उद्यान मे आया हुआ है। वहाँ पर बैठा हुआ वह सोच रहा है कि भाग्य ने हमारे सभी प्रयत्नों को विफल कर दिया है। नन्द वंश के नष्ट हो जाने पर पर्वतेश्वर को आधार बनाकर महाराज नन्द के राज्य को वापिस ले लेने का मैंने प्रयत्न किया। किन्तु दुर्भाग्य से उनके भी दिवंगत हो जाने पर मैंने मलयकेतु को अपना आधार बनाया। किन्तु मुझे सदैव असफलता ही मिली। अब क्या किया जाय? इतने में अचानक ही उसकी दृष्टि उस कृत्रिम फांसी लगाने वाले पुरुष पर पडती है। वह उसके समीप जाकर पूछता है कि तुमको क्या कष्ट है कि जिसके कारण तुम फांसी लगा रहे हो?