भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

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बड़े दुःख के साथ वह उत्तर देता है कि इस नगर में जिष्णुदास नामक एक सेठ है जो कि मेरा परम मित्र है। उसने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति दान में दे दी है और वह अग्नि में जल मरने के लिये नगर से बाहर चला गया है। अतः उसकी मृत्यु के समाचार को सुनने से पूर्व ही मैं अपना प्राणान्त कर देने के लिये फाँसी लगा रहा हूँ। यह सुनकर राक्षस उस पुरुष के मित्र के मरने के कारण को जानना चाहता है। पुरुष बतलाता है—मेरे मित्र का एक अभिन्न मित्र चन्दनदास इसी नगर का निवासी है। उसने मन्त्री राक्षस के परिवार को अपने यहाँ छिपा रखा है। चाणक्य एवं चन्द्रगुप्त द्वारा बार-बार मांगे जाने पर भी वह राक्षस के परिवार को उनके संरक्षण में नहीं दे रहा है। अतः उसे फाँसी का दण्ड दिया गया है। इसी कारण उसका मित्र जिष्णुदास उसकी मृत्यु से पूर्व ही अपने को अग्नि मे भस्मसात् कर देना चाहता है। और मैं भी अपने मित्र जिष्णुदास के मरने से पूर्व ही मर जाना उचित समझता हूँ। यह सुनकर राक्षस उस पुरुष से कहता है कि तुम जाकर जिष्णुदास को मरने से रोको। मैं भी चन्दनदास के प्राणों की रक्षा अपनी तलवार से करूँगा। बाद में जब वह पुरुष यह जान लेता है कि यही मन्त्री राक्षस हैं तो वह उनके पैरों पर गिर जाता है और कहता है—"आप तलवार द्वारा चन्दनदास को बचाने का उपाय न करें क्योकि शकटदास सम्बन्धी घटना के पश्चात् बधिक लोग अत्यधिक सतर्क हो गये हैं। यदि वे लोग वध्यस्थल पर सशस्त्र आते हुये किसो को देख लेते हैं तो वध्य व्यक्ति को तुरन्त ही मार डालते हैं।" इसके अनन्तर वह पुरुष चला जाता है।

तदनन्तर राक्षस सोचता है कि चाणक्य महान् कूटनीतिज्ञ है। यदि उसने अपनी योजना के अनुसार शकटदास को मेरे समीप भिजवाया था तो उसको मारने के लिये नियुक्त वधिको को क्यों प्राणदण्ड दिया ? और यदि शकटदास उसकी योजना का अंग नहीं है तो उसने मेरे विरुद्ध ऐसा कूट-पत्र क्यों लिखा ?

इस भाँति सोचता हुआ राक्षस निश्चय करता है कि यदि शस्त्र-बल से चन्दनदास को बचाना कठिन है तो मैं उसके छुटकारे के लिये आत्मसमर्पण ही कर देना उचित समझता हूँ।

सप्तम अङ्क—वधिको के साथ वध्यवेष को धारण किये हुये चन्दनदास