मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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चला जा रहा है। उसके साथ उसकी स्त्री और बच्चे भी चल रहे हैं। एक वधिक आगे-आगे यह घोषणा करता हुआ चल रहा है कि हट जाना लोगो, हट जाओ। यदि तुम लोगो को अपने प्राण, धन-सम्पत्ति तथा परिवार से मोह हो तो विष के सदृश राजद्रोह से अपने को बचाये रहो।
वध्यस्थान पर पहुँचकर चन्दनदास अपनी पत्नी को समझाता है कि मुझे यह दण्ड किसी अनुचित आचरण के कारण नही दिया गया है, मित्र के कार्य से ही मुझे यह दण्ड मिला है। अतः यह रोने का समय न होकर प्रसन्नता का है। अब तुम वापिस घर जाओ। रुदन करता हुआ उसका पुत्र उसे प्रणाम करते हुये अपने भावी कर्तव्य के बारे में उससे पूछता है। चन्दनदास कहता है— "बेटा ! वहाँ जाकर रहना, जहाँ चाणक्य न पहुँच सके।" इतने में वधिक चन्दनदास से कहता है "सेठ जी ! शूली गढ चुकी है, तैयार हो जाइये।" यह सुनते ही चन्दनदास की पत्नी चिल्लाने लगती है—"लोगो, बचाओ रे बचाओ !" इसी समय राक्षस आकर वहाँ उपस्थित हो जाता है और वधिको से कहता है—"चन्दनदास को मत मारो और दुष्ट चाणक्य से कह दो कि राक्षस आ गया है वह यहाँ वध्यशाला में स्थित है।"
यह समाचार पाकर चाणक्य आता है। वह राक्षस के चरणो का स्पर्श कर प्रणाम करता है। राक्षस कहता है कि मैं चाण्डालों द्वारा छुआ जा चुका हूँ अतः मुझे न छुइये। यह सुनकर चाणक्य उसे बतलाता है कि ये चाण्डाल नहीं हैं। इनमें से एक तो आपका सेवक सिद्धार्थक है और दूसरा राजपुरुष है जिसका नाम भुसिद्धार्थक है। इन्हीं दोनों के द्वारा विश्वास उत्पन्न कर शकटदास द्वारा, बिना उसके कुछ भी जाने-बूझे, मैंने ही वह कूट-पत्र लिखवाया था। भद्रभट, जीवसिद्धि आदि सभी मेरे ही गुप्तचर हैं। जीर्ण उद्यान में फाँसी लगाने वाला पुरुष भी मेरा ही गुप्तचर था। यह सब कार्य मैंने आपसे चन्द्रगुप्त का सम्बन्ध स्थापित करने के निमित्त किया है।
इतने में चन्द्रगुप्त भी वहाँ आ जाता है और विनीत भाव से राक्षस को प्रणाम करता है। राक्षस उसे विजयी होने का आशीर्वाद देता है।
इसके पश्चात् चाणक्य राक्षस से कहता है कि यदि आप वस्तुतः चन्दनदास का जीवन चाहते हैं तो इस शस्त्र को ग्रहण कर चन्द्रगुप्त के मन्त्रि-पद को