मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११६॥ मुद्रा राक्षस-
प्रतीहारी —(मलयकेतु के पैरों पर गिर कर) कुमार! हम [अभय] दान दीजिए।
—भद्र! उठो, शरणागत जन यहा सदा अभय हैं। [वृत्तान्त] का वृत्तान्त कहो।
५ राक्षत्रा —(उठ कर) सुनिए। मुझ को अमात्य राक्षस ने [पत्र] दे कर चन्द्रगुप्त के पास भेजा था।
—जबानी क्या कहने कहा था वह कहो।
—कुमार! मुझ को अमात्य राक्षस ने यह कहने [कहा था] कि मेरे मित्र कुलूत देश के राजा चित्रवर्मा, [मलय]पति सिंहनाद, कश्मीरेश्वर पुष्कराक्ष, * सिन्धु [देशाधिपति] सिन्धुषेन और पारसीक पालक मेघनाक्ष इन पाच
* [पुष्करा]क्ष राजा के विषय में मुद्राराक्षस के कवि को भ्रम हुआ है यह सम्भव [राज]तरगिणी में कोई राजा पुष्कराक्ष नाम का नहीं है। जिस समय में [चन्द्र]गुप्त राज्य करता था उस समय कश्मीर में विजय जयेन्द्र संधिमान [गोपाल]सेन इन्हीं राजा के होने का सम्भव है। कनिगहम लैसन, विल्सन [आदि के] मत में सौ बरस के लगभग का अन्तर है, इसी से मैंने यहा कई [संक्षेप] ना लिखा। इन राजाओ के जीवनइतिहास में पटने तक किसी का [उल्लेख नहीं] है और न चन्द्रगुप्त के काल की किसी घटना से उन से सम्बन्ध है। [जो कुछ] लिखा हो यह सम्भव हो सकता है। क्योंकि मेघवाहन पहले [पारसीक देश में] था फिर कश्मीर का राजा हुआ। भ्रम से इस को पारसीकराज [समझ लिया हो] या सिल्यूकस का शैलाक्ष अनुवाद न कर के मेघनाक्ष किया हो [और सिल्यूक]षैन से सिंधुसेन निकाला हो। भारतवर्ष की पश्चिमोत्तर सीमा पर [सिकन्दर] के मरने से बडा ही गडबड था इस से कुछ शुद्ध वृत्तान्त नहीं [मिलता] कि कवि ने जो कुछ उस समय सुना लिख दिया। वा यह भी [हो सकता है कि यह दे]श और नाम केवल काव्यकल्पना हो। इतिहासों से यह भी [पाया जाता है कि मे]गास्थनिस (Megasthenes) नामक एक राजदूत सिल्यूकस का [चन्द्रगुप्त के पास] आया था। सम्भव है कि इसी का नाम मेघनाक्ष लिखा हो। यदि [राजतरंगिणी का] हिसाब लीजिए तो एक दूसरी ही लट मिलती है। इस के मत से [कलि संवत् के बि]तिते महाभारत का युद्ध हुआ। फिर १०१ बरस में तीन गोनर्द