मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चम अङ्क ।
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राजाओं से आप से पूर्व मे सन्धि हो चुकी है । इस मे पहिले तीन तो मलयकेतु का राज चाहते है और बाकी दो खजाना और हाथी चाहते हैं । जिस तरह महाराज ने चाणक्य को उखाड़ कर मुझ को प्रसन्न किया उसी तरह इन लोगों को भी प्रसन्न करना चाहिए । यही राज-सन्देश है ।
मलयकेतु ।—( आप ही आप ) क्या चित्रवर्म्मादिक भी हमारे द्रोही हैं ? तभी राक्षस मे उन लोगों की ऐसी प्रीति है ।
( प्रकाश ) विजये ! हम अमात्य राक्षस को देखा चाहते हैं । १
हुए, अब ७५४ ग० क० समबत हुआ । इस के पीछे १२६६ बरस के राजाओ का वृत्ता नहीं मालूम । ( २०२० ग० क० ) इस समय के ८६७ वर्ष पीछे उत्पलाक्ष, हिरण्याक्ष और हिरण्यकुल इस नाम के राजा हुए । २७६० ग० क० के पास इन का राज आरम्भ हुआ और २८८७ ग० क० तक रहा । इस वर्ष गत कलि ४६८२ इस से चन्द्रगुप्त का समय २८०० ग० क० हुआ तो उत्पलाक्ष हिरण्य वा हिरण्याक्ष राजा राजतरंगिणी के मत से चन्द्रगुप्त के समय में थे । ( राजतरंगिणी प्र० त० २८७ श्लोक से ) ।
“ उत्पलाक्ष इति ख्यातिं पेशलाक्षस्तथा गतः ।
तत्सूनुस्त्रि शत सार्द्धान् वर्षाणामवशन्महीम् ॥
तस्यसूनुर्हिरण्याक्ष स्वनामाकपुर व्यधात् ।
क्ष्मा सप्तत्रिंशतवर्षान्सप्तमासाश्च भुक्तवान् ॥
हिरण्यकुलइत्यस्थ हिरण्याक्षस्य चात्मज
षष्टि षष्टिच मुकुलस्तत्सूनुरभवत् समाः ॥
अथम्लेच्छगणाकीर्णे मण्डले चण्डचेष्टितः ।” इत्यादि ।
यह सम्बन्ध दो तीन बातो से पष्ट होता है । एक तो यह स्पष्ट सम्भव है कि उत्पलाक्ष का पुष्कराक्ष हो गया हो । दूसर उन्हीं लोगो के समय उस प्रान्त में म्लेच्छो का आना लिखा है । तीसरे इसी समय से गान्धार, बर्बर आदि देशो के लोगो का व्यवहार यहा प्रचलित हुआ । इन बातो से निश्चित होता है कि यही उत्पलाक्षवा हिरण्याक्ष पुष्कराक्ष नाम से लिखा है, विरोध केवल इतना ही है कि राजतरंगिणी में चन्द्रगुप्त का वृत्तान्त नहीं है ।