मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६ मुद्राराक्षस ।
एक मीठा फल महानन्द के पास अपने दूत के द्वारा भेज दिया। राजा की सभा का कोई भी मनुष्य इस का आशय न समझ सका, किन्तु चन्द्रगुप्त ने सोच कर कहा कि अंगीठी यह दिखलाने को भेजी है कि मेरा क्रोध अग्नि है और सर सों यह सूचन कराती है कि मेरी सेना असंख्य है और फल भेजने का आशय यह है कि मेरी मित्रता का फल मधुर है। इन के उत्तर मे चन्द्रगुप्त ने एक घड़ा जल और एक पिजडे मे थोडे से तीतर और एक अमूल्य रत्न भेजा, जिस का आशय यह था कि तुम्हारी सेना कितनी भी असंख्य क्यो न हो हमारे १० वीर उस को भक्षण करने मे समर्थ है और तुम्हारा क्रोध हमारी नीति से सहज ही बुझाया जा सकता है और हमारी
सवैया —रूप की रूपनिधान अनूप अगौठी नई गढि मोल मगाई।
ता मवि पावकपुंज धरयो गिरिधारन जामें प्रभा अधिकाई॥
तेज सो ताके ललाई भई रज मै मिली यासु सबै रजताई।
मानो प्रवाल की थाल बनाय क लाल की रास बिसाल लगाई॥ १॥
ताकि कै पावक दूत के हाथ दै बात कही इहि भाति बुझाय कै।
भोज भुआल सभा मह स मुख राखि कै यो कहियो सिर नाय कै॥
याहि पठायो जरासुत नै अवलोकहु नीके अधीरज लाय कै।
पुत्र खपाय कै नातिन पाय कै जी हौ नै पाय कै कौन उपाय कै॥ २॥
दोहा—सुनत चार तिहि हाथ लै, गयो भैम दरबार।
वासब ऐसे कैक सब, जहां बैठे सरदार॥ ३॥
अडिल्ल —जाय जरासुतदूत भैमपतिपइपरयौ। खिन्नराऊ जगहियेसभ्रमभरयौ।
जगतजरावनद्रव्यपातआगेधर्यो। सोचनराहनै अभय हाल बरननकर यो॥४॥
सुनिनिहसैजदुवीरजीतकीचायसों। ह सि बोले गोवि द कहहु यह रायसो।
उचितससुरपन कीन अवकुन यायसो। चही दमाद सहाय सुताकां हानमो॥५
सोरठा—इमि कहि दूत गहि चाय, आप आप सिखि मे दिया।
तुरतहि गयो बुझाय, ज्ञान पाय मन भ्रान्ति॥ ६॥
विदा किये नृप दूत, उर मै सर का य क करि।
निरखि बृहद्रथ पूत, भवन सहित कोप्यो अतिहि॥ ७॥