भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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पूर्व्वकथा । १७

मित्रता सदा अमूल्य और एक रस है। ऐसे ही तीन पुतली- वाली कहानी भी इसी के साथ प्रसिद्ध है। इसी बुद्धिमानी के कारण चन्द्रगुप्त से उस के भाई लोग बुरा मानते थे; और महानन्द भी अपने औरस पुत्रों का पक्ष कर के इस से कुढ़ता ५ था। यह यद्यपि शूद्रा के गर्भ से था, परन्तु ज्येष्ठ होने के कारण अपने को राज का भागी समझता था, और इसी से इस का राजपरिवार से पूर्ण वैमनस्य था। चाणक्य और शकटार ने इसीसे निश्चय किया कि हम लोग चन्द्रगुप्त को राज का लोभ देकर अपनी ओर मिला लें और नन्दों का नाश कर के इसी को राजा बनावें। १०

यह सब सलाह पक्की हो जाने के पीछे चाणक्य तो अपनी पुरानी कुटी में चला गया और शकटार ने चन्द्रगुप्त और विचक्षणा को तब तक सिखा पढ़ा कर पका कर के अपनी ओर फोड़ लिया। चाणक्य ने कुटी में जाकर हलाहल विष मिले हुए कुछ ऐसे पकवान तैयार किये जो १५ परीक्षा करने में न पकड़े जाय, किन्तु खाते ही प्राण नाश होजाय। विचक्षणा ने किसी प्रकार से महानन्द को पुत्रों समेत यह पकवान खिला दिया, जिस से बेचारे सब के सब एक साथ परमधाम को सिधारे ⁕ ।


⁕ भारतवर्ष की कथाओ में लिखा है कि चाणक्य ने अभिचार से मारण का प्रयोग कर के इन सबों को मार डाला। विचक्षणा ने उस अभिचार का निर्माल्य किसी प्रकार इन लोगो के अंग में छुवा दिया था। किन्तु वर्तमान काल के विद्वान् लोग सोचते हैं कि उस निर्माल्य में मन्त्र का बल नहीं था, चाणक्य ने कुछ औषधि ऐसे विषमिश्रित बनाये थे कि जिन के भोजन वा स्पर्श से मनुष्य का सद्य नाश हो जाय। भट्ट सोमदेव के कथा सरित्सागर के पीठलम्ब के चौथे तरंग मे लिखा है—योगानन्द को ऊंची अवस्था में नये प्रकार की कामवासना उत्पन्न हुई।