भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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१८ मुद्राराक्षस ।

चन्द्रगुप्त इस समय चाणक्य के साथ था । शकटार अपने दुख और पापों से सन्तप्त हो कर निविड़ बन मे चला गया और अनसन कर के प्राण त्याग किये । कोई कोई इतिहासलेखक कहते हैं कि चाणक्य ने अपने हाथ से शस्त्रद्वारा नन्द का वध किया और फिर क्रम से उसके पुत्रों को भी मारा, किन्तु इस


वररुचि ने यह सोच कर कि राजा को तो भोगाविलास से छुट्टी ही नहीं है, इस से राजकाज का काम शकटार निकाला जाय तो अच्छी तरह से चले । यह विचार कर और राजा से पूछ कर शकटार को अन्धे कूप से निकाल कर वररुचि ने मन्त्रीपद पर नियत किया । एकदिन शिकार खेलने में गङ्गा में राजा ने अपनी पांचो उंगली की परछाईं वररुचि को दिखलाना । वररुचि ने अपनी दो उंगलियो की परछाई ऊपर से दिखाई, जिस से राजा के हाथ की परछाईं छिप गई । राजा ने इन संज्ञाओ का कारण पूछा । वर रुचि ने कहा —आप का यह आशय था कि पांच मनुष्य मिल कर सब काय्य साध सकते हैं । मै ने यह कहा कि जो दो चित्त एक हो जाय तो पांच का बल व्यर्थ है । इस बात पर राजा ने वररुचि की बड़ी स्तुति किया । एक दिन राजा ने अपनी रानी को एक ब्राह्मण से खिड़की में से बात करते देख कर उस ब्राह्मण को मारने की आज्ञा किया, किन्तु अनेक कारण से वह बच गया । । वररुचि ने कहा कि आप के जन-महल की यही दशा है और अनेक स्त्रीवेषधारी पुरुष महल में रहते हैं और उन सबों को पकड़ कर दिखला दिया और इसी से उस ब्राह्मण के प्राण बचे । एक दिन योगानन्द की रानी के एक चित्र मे जो महल मे लगा हुआ था, वररुचि ने जांघ में तिल बना दिया । योगानन्द को गुप्त स्थान में वररुचि के तिल बनाने से उस पर भी सन्देह हुआ और शकटार को आज्ञा दिया कि तुम वररुचि को आज ही रात को मार डालो । शकटार ने उस को अपने घर में छिपा रक्खा और किसी और को उस के बदले मार कर उसका मारना प्रकट किया । एक बेर राजा का पुत्र हिरण्यगुप्त जंगल मे शिकार खेलने गया था, वहां रात को सिंह के भय से एक पेड़ पर चढ़ गया । उस वृक्ष पर एक भालू था, किन्तु इस ने उस को अभय दिया । इन दोनों में यह बात ठहरी कि आधी रात तक कुंवर सोये आधी पहरा