भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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पूर्ववकथा । १६

विषय का कोई दृढ़ प्रमाण नहीं है। चाहे जिस प्रकार से हो चाणक्य ने नन्दों का नाश किया, किन्तु केवल पुत्र सहित राजा के मारने ही से वह चन्द्रगुप्त को राजसिंहासन पर न बैठा सका, इस से अपने अन्तरङ्ग मित्र जीवसिद्धि को क्षपणक के वेष में राक्षस के पास छोड़कर आप राजा लोगों से सहायता लेने की इच्छा से विदेश निकला। अन्त में अफगानिस्तान वा उस के उत्तर ओर के निवासी पर्वतक नामक लोभपरतन्त्र एक राजा से मिलकर और उस को जीतने के पीछे मगध राज्य का आधा भाग देने के नियम पर उस को पटने पर चढ़ा लाया। पर्वतक के भाई का नाम वैरोधक * और पुत्र का


-, फिर भालू सोवै कुंवर पहरा दे । भालू ने अपना मित्रधर्म्म निबाहा और सिंह के बहकाने पर भी कुंवर की रक्षा किय। किन्तु अपनी बारी में कुंवर ने सिंह के बहकाने से भालू को ढकलना चाहा, जिस पर उस ने जाग कर मित्रता के कारण कुंवर को मारा तो नहीं किन्तु कान में मूत दिया, जिस से कुंवर गूंगा और बहिर हो गया। राजा को बेटे की इस दुर्दशा पर बड़ा सोच हुआ और कहा कि वररुचि जीता होता तो इस समय उपाय सोचता। शकटार ने यह अवसर समझ कर राजा से कहा कि वररुचि जीता है और लाकर राजा के सामने खड़ा कर दिया। वररुचि ने कहा—कुंवर ने मित्रद्रोह किया है उस का फल है। यह वृत्त कह कर उस को उपाय से अच्छा किया। राजा ने पूछा—तुम ने यह सब वृत्तान्त किस तरह जाना? वररुचि ने कहा-योगबल से, जैसे रानी का तिल। (ठीक यही कहानी राजा भोज, उस की रानी भानुमती और उस के पुत्र और कालिदास की भी प्रसिद्ध है) यह सब कह कर और उदास हो कर वररुचि जंगल में चला गया। वररुचि से शकटार ने राजा को मारने को कहा था, किन्तु वह धर्मिष्ठ था इस से सम्मत न हुआ। वररुचि के चले जाने पर शकटार ने अवसर पा कर चाणक्य द्वारा कृत्या से नन्द को मारा।

* लिखी पुस्तकों में यह नाम विरोधक, वैरोधक, वैरोचक वैबोधक, विरोध, वैराध इत्यादि कई चाल से लिखा है।