मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२२ मुद्राराक्षस-
यह भी है ? (राक्षस के पहने हुए आभरण को देख कर आप ही आप) क्या यह पिता के पहने हुए आभरण है ? (प्रकाश) आर्य, यह आभरण आपने कहा से पाया ? राक्षस। — जौहरी से मोल लिया था । ५ मलयकेतु। — विजये ! तुम इन आभरणों को पहचानती हौ ? प्रतिहारी। — देख कर आसू भर के) कुमार ! हम सुगृहीत नामधेय महाराज पर्व्वतेश्वर के पहिरने के आभरणों को न पहिचानैगे ? मलयकेतु। — (आखों मे आसू भर के) १० भूषण प्रिय ! भूषण सबै, कुल भूषण ! तुव अङ्ग । तुव मुख ढिग इमि सोहतो, जिमि ससि तारन सङ्ग ॥ राक्षस। (आपही आप) य पर्व्वतेश्वर के पहिने हुए आभरण हैं ? (प्रकाश) जाना, यह भी निश्चय चाणक्य के भेजे हुए जौहरियों ने ही बेचा हे । १५ मलयकेतु। — आर्य ! पिता के पहने हुए आभरण और फिर चन्द्रगुप्त के हाथ पडे हुए जौहरी बेचै, यह कभी हो नही सकता । अथवा हो सकता है । अधिक लाभ के लोभ सों, क्रूर ! त्यागि सब नेह । बदले इन आभरन के तुम बेच्यौ मम देह ॥ २० राक्षस। — (आपही आप) अरे ! यह दाव तो पूरा बैठ गया । मम लेख नहि यह किमि कहैं मुद्रा छुपी जब हाथ की । विश्वास होत न शकट तजि हे प्रीति कबहु साथ की ॥ पुनि बेचि हैं नृप चन्द्र भूषण कौन यह पतियाइहैं । तासों भलो अब मौन रहनो कथन तैं पति जाइ है ॥ २५ मलयकेतु। — आर्य ! हम यह पूछते हैं । - राक्षस। — जो आर्य हो उस से पूछो, हम अब पापकारी अनार्य हो गये है ।