भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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पञ्चम अङ्क । १२१

भागुरायण । - ( आप ही आप ) आर्य चाणक्य के लोग बिना निश्चय समझे हुए कोई बात नही करते । जो शकटदास आकर यह चिट्ठी किस प्रकार लिखी गई है यह सब वृत्तान्त कह देगा तो मलयकेतु फिर बहक जायगा ।

प्रकाश ) कुमार ! शकटदास, अमात्य राक्षस के सामने लिखा होगा तो भी न स्वीकार करेंगे, इस से उन का कोई और लेख मगाकर अक्षर मिला लिये जाय ।

मलयकेतु ।—विजये ! ऐसा ही करो ।

भागुरायण ।—और मुहर भी आवै ।

मलयकेतु । - हा, यह भी । १०

कञ्चुकी । - जो आज्ञा ( बाहर जाता है और पत्र और मुहर लेकर आता है ।) कुमार ! यह शकटदास का लेख और मुहर है ।

मलयकेतु - ( देख कर और अक्षर और मुहर को मिलान कर के ) आर्य ! अक्षर तो मिलते है । १५

राक्षस ।--( आप ही आप ) अक्षर नि सन्देह मिलते हैं, किन्तु शकटदास हमारा मित्र है, इस हिसाब से नही मिलते, तो क्या शकटदास ही ने लिखा अथवा

पुत्र दार की याद करि, स्वामि भक्ति तजि देत ।
छोड़ि अचल जस कों करत, चल धन सों जन हेत ॥ २०

या इसमे सन्देह ही क्या है ?

मुद्रा ताके हाथ की, सिद्धार्थक हू मित्र ।
ताही के कर को लिख्यौ, पत्रहु साधन चित्र ॥
मिलि कै शत्रुन सों करन, भेद भूलि निज धर्म ।
स्वामि विमुख शकटहि कियो, निश्चय यह खल कर्म ॥ २५

मलयकेतु ।—आर्य ! श्रीमान ने तीन आभरण भेजे, सो मिले, यह जो आप ने लिखा है सो उसी में का एक आभरण