मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२० मुद्राराक्षस—
राक्षस। — कुमार ! मार की डर से लोग क्या नहीं कह देते ? मलयकेतु। — भागुरायण ! चिट्ठी दिखला दो और संदेशा वह अपने मुह से कहैगा । भागुरायण। — (चिट्ठी खोल कर 'स्वस्ति कही से कोई ५ किसी को' इत्यादि पढता है ।) राक्षस। — कुमार ! कुमार ! यह सब शत्रु का प्रयोग है । मलयकेतु। — लेख अशून्य करने को आर्य ने जो आभरण भेजे हैं वह शत्रु कैसे भेजेगा ? (आभरण दिखलाता है) राक्षस। — कुमार ! यह मैं ने किसी को नहीं भेजा । कुमार ने १० यह मुझ को दिया, और मै ने प्रसन्न होकर सिद्धार्थक को दिया । भागुरायण। — अमात्य ! ऐसे उत्तम आभरणों का विशेष कर अपने अङ्ग से उतार कर कुमार की दी हुई वस्तु का—यह पात्र है ? १५ मलयकेतु। — और संदेश भी बड़े प्रामाणिक सिद्धार्थक से सुनना—यह आर्य ने लिखा है । राक्षस। — कैसा संदेश और कैसी चिट्ठी ? यह हमारा कुछ नहीं है ! मलयकेतु। — तो मुहर किस की है ? २० राक्षस। — धूर्त्त लोग कपटमुद्रा भी बना लेते हैं । भागुरायण। — कुमार ! अमात्य सच कहते हैं । सिद्धार्थक, यह चिट्ठी किस की लिखी है ? सिद्धार्थक। — (राक्षस का मुंह देख कर चुप रह जाता है ।) भागुरायण। — चुप मत रहो । जी कड़ा कर के कहो । २५ सिद्धार्थक। — आर्य ! शकटदास ने । राक्षस—शकटदास ने लिखा तो मानो मैने ही लिखा । मलयकेतु। — विजये ! शकटदास को हम देखा चाहते हैं ।