मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३२ मुद्राराक्षस—
अति ही तीखन होन सों, फोरत स्रोता कान ।
जब न समायो घरन मैं, तब इत कियो पयान ॥
सख पटह धुनि सों मिल्यौ, भारी मङ्गल नाद ।
निकस्यौ मनहु दिगन्त को, दूरी देखन स्वाद ॥
५ [कुछ सोचकर] हा, जाना। यह मलयकेतु के पकड़े जाने पर राजकुल * (रुक कर) मौर्यकुल का आनन्द देने को हो रहा है।
(आंखों में आसू भर कर) हाय ! बड़े दुख की बात है।
मेरे बिनु अब जीति दल, शत्रु पाइ बल घोर ।
१० मोहि सुनावन हेत ही, कीन्हौँ शब्द कठोर ॥
पुरुष।—अब तो यह बैठे है तो अब आर्य चाणक्य की आज्ञा पूरी करैं। (राक्षस की ओर न देख कर अपने गले मे फासी लगाना चाहता है।)
राक्षस (देख कर आप ही आप) अरे यह फासी क्यों लगाता है? निश्चय कोई हमारा सा दुखिया है। जो हो,
१५ पूँछैं तो सही (प्रकाश) भद्र, यह क्या करते हौ?
पुरुष।—(रोकर) मित्रों के दुख से दुखो होकर हमारे ऐसे मन्दभाग्यों को जो कर्त्तव्य है।
राक्षस।—(आप ही आप) पहले ही कहा था, कोई हमारा
२० सा दुखिया है। (प्रकाश) भद्र+जो अतिगुप्त वा किसी विशेष कार्य का बात न हो तो हम से कहो कि तुम क्यों प्राण त्याग करने हो?
पुरुष।—आर्य ! न तो गुप्त ही हे न कोई बड़े काम की बात है, परन्तु मित्र के दुख से मै अब क्षण भर भी ठहर
२५ नही सकता।
* जहा ऐसी उक्ति हे,ता है वहा यह ध्वनि है कि मना " ६व रु जो कहा था वह ठीक है रुक कर आग्र से कुछ और कह दिया ।
+ यहा संस्कृत में व्यसनि ब्रह्मचारिन सम्बोधन है।