भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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छठा अङ्क । १२१

हाय ! यह मन्द भाग्य अब कहा जाय ? ( चारो ओर देख कर ) चलो, इस पुरानी बारी मे कुछ देर ठहर कर मित्र चन्दनदास का कुछ समाचार ले । ( घूम कर आप ही आप ) अहा ! पुरुषों की भाग्य से उन्नति अवनति की भी क्या क्या गति होती है कोई नही जानता । ५

जिमि नव ससि कहँ सब लखत, निज निज करहि उठाय ।
तिमि नृप सब हम को रहे, लखत अनन्द बढ़ाय ॥
चाहत हे नृपगन सबै, जासु कृपा दृग कोर ।
सो हम इत संकित चलत, मानहुँ कोऊ चोर ॥

वा जिस के प्रसाद से यह सब था, जब वही नहीं है तो यह १० होईगा । (देख कर) यह पुराना उद्यान कैसा भयानक हो रहा है ।

नसे विपुल नृप कुल सरिस, बड़े बड़े गृह जाल ।
मित्र नास सों साधुजन, हिय सम सूखे ताल ॥
तरुवर भे फलहीन जिमि, बिधि बिगरे सब रीति ।
तृन सों लोपी भूमि जिमि, मति लहि मूढ़ कुनीति ॥ १५
तीछुन परसु प्रहार सों, कटे तरोवर गात ।
रोअत मिलि पिड्डुक खग, ताके घाव लखात * ॥
दुखी जानि निज मित्र कहँ, अहि मन लेत उसास ।
निज केंचुल मिस धरत है, फाहा तरु-ब्रन पास ॥
तरुगन को सूख्यो हियो, छिदै कीट सों गात । २०
दुखी पत्र फल छाह बिनु, मनु मसान सब जात ॥

तो तब तक हम इस सिला पर, जो भाग्यहीनों को सुलभ है, लेटैं । ( बैठ कर और कान देकर सुन कर ) अरे ! यह शंख डंके से मिला हुआ नान्दी शब्द कहा हो रहा है ?


* वृक्ष के खोढरे में से जो शब्द निकलता है वही मानो वृक्ष रोते हैं और उन वृक्षों पर पेंडुकी बोलती हैं वह मानो रोन में वृक्षो का साथ देती हैं ।