मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३० मुद्राराक्षस—
देखादेखी प्रजहु सब, कीनो ता अनुगौन ।
तजि कै निज नृप नेह सब, कियो कुसुमपुर भौन ॥
होइ बिफल उद्योग मैं, तजि कै कारजभार ।
आप्त मित्र हू थकि रहे, सिर बिनु जिमि अहि छार ॥
५ तजि कै निज पति भुवनपति, सुकुल जात नृप नन्द ।
श्री वृषली गइ वृषल ढिग, सील त्यागि करि छन्द ॥
जाइ तहा थिर ह्वै रही, निज गुन सहज बिसारि ।
बस न चलत जब बाम बिधि, सब कछु देत बिगारि ॥
नन्द मरे सैलेश्वरहि, देन चह्यौ हम राज ।
सोऊ बिनसे तब कियो, तासुत हित सो साज ॥
बिगर्यौ तौन प्रबन्ध हू, मिठ्यौ मनोरथ मूल ।
दोस कहा चानक्य को, दैवहि भो प्रतिकूल ॥
वाहरे म्लेच्छ मलयकेतु की मूर्खता ! जिस ने इतना नही समझा कि—
१५
मरे स्वामिहू नहि तज्यौ, जिन निज नृप अनुराग ।
लोभ छाड़ि दै प्रान जिन, करी सत्रु सों लाग ॥
सोई राक्षस सत्रु सों, मिलि है यह अन्धेर ।
इतनो सूझ्यौ वाहि नहि, दई दैव मति फेर ॥
सो अब भी शत्रु के हाथ में पड़ के राक्षस बन मे चला जायगा, पर चन्द्रगुप्त से संधि न करैगा । लोग झूठा कहै, यह अपयश हो, पर शत्रु की बात कौन सहैगा ? (चारो ओर देख कर) हा ! इसी प्रान्त में देव नन्द रथ पर चढ़ कर फिरने आते थे ।
इतहि देव अभ्यास हित, सर सजि धनु सन्धानि ।
२५ रचत रहे भुव चित्र सम, रथ सुचक्र परिखानि ॥
जहँ नृपगन संकित रहे, इत उत थमे लखात ।
सोई भुव ऊजर भई, दृगन लखी नहि जात ॥