मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंछठा अङ्क । १३७
पुरुष । सेठ चन्दनदास के प्राण बचाने का उपाय मैं ने सुना किन्तु ऐसे टेढ़े समय मे इसका परिणाम क्या होगा, यह मैं नही कह सकता (राक्षस को देख कर पैर पर गिरता है) आर्य ! क्या सुगृहीत नामधेय अमात्य राक्षस आप ही है ? यह मेरा सन्देह आप दूर कीजिए । ५
राक्षस ।—भद्र ! भर्तृकुल विनाश से दुखी और मित्र के नाश का कारण यथार्थ नामा अनार्य राक्षस मैं ही हूं ।
पुरुष ।—( फिर पैर पर गिरता है) धन्य है ! बड़ा ही आनन्द हुआ । आप ने हम को आज कृतकृत्य किया ।
राक्षस ।—भद्र ! उठो । देर करने की काई आवश्यकता नही । १० जिष्णुदास से कहो कि राक्षस चन्दनदास को अभी छुड़ाता है ।
(खङ्ग खींचे हुए, 'समर साध' इत्यादि पढ़ता हुआ इधर उधर टहलता है)
पुरुष ।—(पैर पर गिर कर) अमात्यचरण ! प्रसन्न हों । मैं १५ यह बिनती करता हूँ कि चन्द्रगुप्त दुष्ट ने पहले शकटदास के वध की आज्ञा दी थी । फिर न जाने कौन शकटदास को छुड़ा कर उस को कही परदेस मे भगा ले गया ! आर्य शकटदास के वध मे धोखा खाने से चन्द्रगुप्त ने क्रोध कर के प्रमादी समझ कर उन वधिकों ही को मार डाला । २० तब से वधिक जो किसी को वध्यस्थान मे ले जाते हैं और मार्ग मे किसी को शस्त्र खींचे हुए देखते हैं तो छुड़ा ले जाने के भय से अपराधी को बीच ही में तुरत मार डालते हैं । इस से शस्त्र खींचे हुए आप के वहा जाने से चन्दनदास की मृत्यु में और भी शीघ्रता होगी (जाता है) । २५