मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५२ मुद्राराक्षस-
( पञ्चम अंक की समाप्ति और षष्ठ अंक के आरम्भ मे )
काफी ताल होली का।
छुलियन सों रहो सावधान नहि तो पछताओगे। इन की बातन मै फसि रहिहौ सबहि गवाओगे ॥ स्वारथ लोभी जन
५ सों आखिर दगा उठाओगे। तब सुख पैहो जब साचन सों नेह बढाओगे ॥ छुलियन सों० ॥ ७ ॥
( छठे अङ्क की समाप्ति और सातवे अङ्क के आरम्भ मे )
'जिन के मन मे सिय राम बसै' इस धुन की )
जग सूरज चंद टरै तो टरै पे न सज्जननेहु कबो बिचलै।
१० धन संपति सर्बस गेह नसौ नहि प्र म की मेड सों एड् टलै ॥
सतवा दिन कौ तिन का सम प्रान रहै तो रहै वा ढलै तो ढलै।
निज मीत का प्रीत प्रतीत रहौ इक और सब जग जाउ भलै ॥ ८ ॥
( अन्त मे गाने को ) ( बिहाग—श्लोक के अर्थ अनुसार )
१५ हरौ हरि रूप सबै जग बाधा। जा सरूप सों धरनि उधारी निज जन कारज साधा ॥ जिमि तब दाढ अग्र लै राखी महि हति असुर गिरायो। कनक दृष्टि म्लेच्छन हू। तमि किन अब लौं मारि नसायो ॥ आरज राज रूप तुम तासों मागत यह वरदाना। प्रजा कुमुदगन चन्द्र नृपति को करहु सकुल
२० कल्याना ॥ ६ ॥
( बिहाग ठुमरी )
पूरी अमी की कटोरिया सी चिरजीओ सदा विक्टोरिय रानी। सूरज चंद प्रकास करैं जब लौं रहै सात हू सिन्धु म पानी ॥ राज करौ सुख सांतवलो निज पुत्र औ पौत्र समेत
२५ सयानी। पालौ प्रजागन कों सुख सों जग कीरति गान कर गुन गानी ॥ १० ॥