मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार ( अक्षर ) क । १५१
जग मै घर की फूट बुरी । घर के फूटहि सों बिनसाई सुबरन लंकपुरी ॥ फूटहि सों सब कौरव नासे भारत युद्ध भयो । जाको घाटो या भारत मै अब लौ नहि पुजयो ॥ फूट हि सों जयचन्द बुलायो जवनन भारत धाम । जाको फल अबलौ भोगत सब आरज होइ गुलाम ॥ फूटहि सों नवनन्द ५ बिनासे गया मगध को राज । चन्द्रगुप्त को नासन चाह्यो आपु नसे सहसाज ॥ जो जग मै धन मान और बल आपुनो राखन होय । तो अपने घर मै भूलेहू फूट करौ मति कोय ॥३॥ ( दूसरे अङ्क की समाप्ति और तीसरे अङ्क के आरम्भ में ) जग मै तेई चतुर कहावैं । जे सब विधि अपने कारज को १० नीको भांति बनावै ॥ पढ़्यौ लिख्यौ किन होइ जुपै नहि कारज साधन जानै । ताही कों मूरख या जग मै सब कोऊ अनुमानै ॥ छल मै पातक होत जदपि यह शास्त्रन मै बहु गायो । पे अरि सों छल किए दोष नहि मुनियन यहै बताया ॥४॥ ( तीसरे अङ्क की समाप्ति और चतुर्थ अङ्क के आरम्भ मे ) १५ ठुमरी—तिन को ना कछू कबहुं बिगरै, गुरु लोगन को कहनो जे करैं । जिन कों गुरु पन्थ दिखावत है ते कुपन्थ पै भूलि न पाव धरैं ॥ जिन कों गुरु अच्छत आप रहैं ते बिगारे न बैरिन के बिगरैं । गुरु को उपदेस सुनौ सब ही, जग कारज जासों सबै समरै ॥ ५ ॥ २० ( चतुर्थ अङ्क की समाप्ति और पंचम अङ्क के आरम्भ मे ) पूरबी—करि मूरख मित्र मिताई, फिर पछुतैहो रे भाई । अंत दगा खैहौ सिर धुनिहौ रहिहौ सबै गँवाई ॥ मूरख जो कछु हितहू करै तो तामै अन्त बुराई । उलटो उलटो काज करत सब दैहै अंत नसाई ॥ लाख करौ हित मूरख सों पै २५ नाहि न कछु समझाई । अन्त बुराई सिर पै ऐहै रहि जैहो मुह बाई ॥ फिर पछितैहो रे भाई ॥ ६ ॥