भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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२२ मुद्राराक्षस ।

राजाओं ने बड़े आदर से राक्षस को सहायता देना स्वीकार किया तो वह तपोवन के निकट फिर से लौट आया और वहा से चन्द्रगुप्त के मारने को एक विषकन्या+ भेजी और अपना विश्वासपात्र समझ कर जीवसिद्धि को उस के साथ ५ कर दिया। चाणक्य ने जीवसिद्धि द्वारा यह सब बात जान कर और पर्वतक की धूर्तता और विश्वासघातकता से कुढ़ कर प्रकट मे इस उपहार को बडी प्रसन्नता से ग्रहण किया और लानेवाले को बहुत सा पुरस्कार देकर बिदा किया। साझ होने के पीछे धूर्ताधिराज चाणक्य ने इस कन्या को १० पर्वतक के पास भेज दिया और इन्द्रियलोलुप पर्वतक उसी रात को उस कन्या के संग से मर गया। इधर चाणक्य ने यह सोचा कि मलयकेतु यहा रहेगा तो उस को राज्य का हिस्सा देना पड़ेगा, इस से किसी तरह इस को यहा से भगावे तो काम चले। इस कार्य्य के हेतु भागुरायण नामक १५ एक प्रतिष्ठित विश्वासपात्र पुरुष को मलयकेतु के पास सिखा पढ़ा कर भेज दिया। उस ने पिछली रात को मलयकेतु से जा कर उस का बड़ा हित बन कर उस से कहा कि आज चाणक्य ने विश्वासघातकता कर के आप के पिता को विषकन्या के प्रयोग से मार डाला और औसर पाकर आप २० को भी मार डालेगा। मलयकेतु बेचारा इस बात के सुनते ही सन्न हो गया और पिता के शयनागार मे


  • विषकन्या शास्त्रो में दो प्रकार की लिखी है। एक तो थोडे से ऐसे बुरे योग हैं कि उस लग्न में उस प्रकार के ग्रहो के समय जो कन्या उत्पन्न हो उस के साथ जिस का विवाह हो वा जो उस का साथ करे वह साथ ही वा शीघ्र ही मर जाता है। दूसरे प्रकार की विषकन्या वैद्यक रीति से बनाई जाती थी। छोटेपन से बरन गर्भ से कन्या को दूध में वा भोजन में थोडा २ विष देते देते बडी होने पर उस का शरीर ऐसा विषमय हो जाता था कि जो उस का अङ्ग संग करता वह मर जाता।
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