भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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३० मुद्राराक्षस ।

नटी ।—आर्य्य ! यह पृथ्वी ही पर से चन्द्रमा को कौन बचाना चाहता है ? सूत्र०।—प्यारी, मै ने भी नही लखा, देखो, अब फिर से वही पढता हू और अब जब वह फिर बोलैगा तो मै उस की बोली से पहिचान लूगा कि कौन है।


भा सूर्य्य सै आगे नही जाता। विल्सन ने केतु शब्द से मलयकेतु का ग्रहण किया हे। इस मे भी एक प्रकार का अलकार अच्छा रहता है।

चमत्कृत बुद्धिसम्पन्न पण्डित सुधाकर जी न इस विषय में जो लिखा हे वह विचित्र ही है। वह भी प्रकाश किया जाता हं—

करत अधिक अंधियार वह, मिलि मिलि करि हरिच द ।
द्विजराजहु विकसित करत, धान धनि यह हरिच द ॥
श्री बाबू साहब को हमारे अनेक आशीर्वाद,

महाशय !

चन्द्रग्रहण का सम्भव भूच्छाया के कारण प्रति पूर्णिमा के अन्त में होता है और उस समय में केतु और सूर्य्य साथ रहते हैं। परन्तु कतु और सूर्य्य का योग यदि नियत सख्या के अर्थात् पाच राशि सोतरह अश से लेकर छ राशि चौदह अश क वा ग्यारह राशि सोरह अश मे लेकर बारह राशि चौदह अश के भीतर होता है तब ग्रहण होता है और यदि योग नियत सख्या क बाहर पड जाता है तब ग्रहण नही होता इस लिये सूर्य्य केतु के योगही के कारण से प्रत्येक पूर्णिमा मे ग्रहण नही होता। तब

क्रूरग्रह स केतुश्च द्रमस पूर्णामण्टलमिदानीम ।
अभिभवितुमिच्छति बलाद्गद्गत्येन तु बुधयोग ॥

इस श्लोक का यथार्थ अर्थ यह है कि क्रूरग्रह सूर्य्य केतु के साथ च द्रमा क पूर्णम ण्डल को यून करने की इच्छा करता है पर तु हे बुध ! योग जो हं वही बल सै उस च द्रमा की रक्षा करता है। यहा बुध शब्द पण्डित के अर्थ मे सम्बोधन हे, ग्रहवाची कदापि नही हे। बुध शब्द को ग्रहार्थ में ले जान से जो जो अर्थ होते हं वे सब बनावट हैं। इति

स० १८३७ वशाख शुक्ल ५

ऊंचे ह्नौ गुरु बुध कवी मिलि लरि होत विरूप ।
करत समागम सबहि सो, यह द्विजराज अनूप ॥

आप का
पं० सुधाकर।