मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम अंक ।
स्थान—चाणक्य का घर।
(अपनी खुली शिखा को हाथ से फटकारता हुआ चाणक्य आता है)
। क्य। —बता ! कौन है जो मेरे जीते चन्द्रगुप्त को बल से ग्रसना चाहता है ?
सदा दन्ति के कुम्भ को जो बिदारै ।
ललाटै नए चन्द सी जौन धारै ॥
जभाई समै काल सो जौन बाढैँ ।
भलो सिंह को दात सो कौन काढैँ ॥ ९ ॥
और भी
काल सर्पिणी नन्द कुल, क्रोध धूम सी जौन ।
अब हूं बाधन देत नहि, अहो शिखा मम कौन ॥ १० ॥
दहन नन्दकुल बन सहज, अति प्रज्वलित प्रताप ।
को मम क्रोधा नल पतंग, नयो चहत अब पाप ॥ ११ ॥
शारगरव ! शारगरव !!
( शिष्य आता है )
**शिष्य ।—**गुरु जा ! क्या आज्ञा है ?
**चाणक्य ।—**बेटा ! मै बैठना चाहता हू ।
**शिष्य ।—**महाराज ! इस दालान मे बेत की चटाई पहिले ही से बिछी है, आप बिराजिये ।
**चाणक्य ।—**बेटा ! केवल कार्य्य म तत्परता मुझे व्याकुल करती है न कि और उपाध्यायों के तुल्य शिष्य जन से