भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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३४ मुद्राराक्षस ।

अथवा जब तक राक्षस नही पकडा जाता तब तक नन्दों के मारने से क्या और चन्द्रगुप्त को राज्य मिलने से ही क्या ? (कुछ सोचकर) अहा ! राक्षस की नन्दवंश मे कैसी दृढ़ भक्ति है ! जब तक नन्दवंश का कोई भी जीता रहेगा तब तक ५ वह कभी शूद्र का मन्त्री बनना स्वीकार न करेगा, इस से उस के पकडने मे हम लोगों को निरुद्यम रहना अच्छा नही । यही समझ कर तो नन्दवंश का सर्वार्थसिद्धि बिचारा तपोवन मे चला गया तौ भी हमने मार डाला । देखो, राक्षस मलय केतु को मिला कर हमारे बिगाड़ने मे यत्न करता ही जाता है १० (आकाश मे देख कर) वाह राक्षस मन्त्री वाह ! क्यों न हो ! वाह मन्त्रियों मे वृहस्पति के समान वाह ! तू धन्य है, क्योंकि—

जब लौं रहै सुख राज को तब लौं सबै सेवा करै ।
पुनि राज बिगडे कौन स्वामी तनिक नहि चित पे धरै ॥
१५ जे विपतिहू मे पालि पूरब प्रीति काज सवारहीं ।
ते धन्य नर तुम सारिखे दुर्लभ अहै संसय नहीं ॥

इसी से तो हम लोग इतना यत्न करके तुम्हें मिलाया चाहते है कि तुम अनुग्रह करके चन्द्रगुप्त के मन्त्री बनो, क्योंकि—

२० मूरख कातर स्वामिभक्ति कछु काम न आवै ।
पण्डित हूं बिन भक्ति काज कछु नाहि बनावै ॥
निज स्वारथ की प्रीति करैं ते सब जिमि नारी ।
बुद्धि भक्ति दोउ होय तबै सेवक सुखकारी ॥

सो मै भी इस विषय मे कुछ सोता नही हूं, यथाशक्ति २५ उसी के मिलाने का यत्न करता रहता हूं । देखो, पर्व्वतक को चाणक्य ने मारा यह अपवाद न होगा, क्योंकि सब जानते है कि चन्द्रगुप्त और पर्व्वतक मेरे मित्र है तो मै पर्व्वतक को मार