मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम अङ्क । ३५
कर चन्द्रगुप्त का पक्ष निर्बल कर दूंगा ऐसी शंका कोई न करेगा सब यही कहेंगे कि राक्षस ने विषकन्या-प्रयोग करके चाणक्य के मित्र पर्वतक को मार डाला। पर एकान्त मे राक्षस ने मलय केतु के जी मे यह निश्चय करा दिया है कि तेरे पिता को मै ने नहीं मारा चाणक्य ही ने मारा, इस से मलयकेतु मुझ से ५ बिगड़ रहा है। जो हो, यदि यह राक्षस लड़ाई करने को उद्यत होगा तो भी पकड़ जायगा । पर जो हम मलयकेतु को पकड़ेंगे तो लोग निश्चय करलेंगे कि अवश्य चाणक्य ही ने अपने मित्र इस के पिता को मारा और अब मित्रपुत्र अर्थात् मलयकेतु को मारना चाहता है । और भी, अनेक १० देश की भाषा पहिरावा चाल व्यवहार जाननेवाले अनेक वेषधारी बहुत से दूत मै ने इसी हेतु चारो ओर भेज रक्खे हैं कि वे भेद लेते रहें कि कौन हम लोगों से शत्रुता रखता है, कौन मित्र है । और कुसुमपुर निवासी नन्द के मन्त्री और सम्बन्धियों के ठीक ठीक वृत्तान्त का अन्वेषण १५ हो रहा है, वैसे ही भद्रभटादिकों को बड़े बड़े पद देकर चन्द्रगुप्त के पास रख दिया है और भक्ति की परीक्षा लेकर बहुत से अप्रमादी पुरुष भी शत्रु से रक्षा करने को नियत कर दिए हैं । वैसे ही मेरा सहपाठी मित्र विष्णुशर्म्मा नामक ब्राह्मण जो शुक्रनीति और चौसठों कला से ज्योतिषशास्त्र में २० बड़ा प्रवीण है, उसे मै ने पहिले ही योगी बना कर नन्दवध की प्रतिज्ञा के अनन्तर ही कुसुमपुर में भेज दिया है, वह वहां नन्द के मन्त्रियों से मिलता करके, विशेष कर के राक्षस का अपने पर बड़ा विश्वास बढ़ा कर सब काम सिद्ध करेगा, इस से मेरा सब काम बन गया है परन्तु चन्द्रगुप्त सब राज्य २५ का भार मेरे ही ऊपर रख कर सुख करता है । सच है, जो अपने बल बिना और अनेक दुःखों के भोगे बिना राज्य मिलता है वही सुख देता है । क्योंकि—