मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६ मुद्राराक्षस ।
अपने बल सों लावही, यद्यपि मारि सिकार ।
तदपि सुखी नहि होत है, राजा सिंह-कुमार ॥१६॥
( * यम का चित्र हाथ मे लिये योगी का वेष धारण किये दूत आता है । )
५ दूत ।—अरे, और देव को काम नहि, जम को करो प्रनाम ।
जो दूजन के भक्त को, प्रान हरत परिनाम ॥ १७ ॥
और
उलटे ते हू बनत है, काज किये अति हेत ।
जो जम जो सब को हरत, सोई जीविका देत ॥ १८॥
१० तो इस घर मे चल कर जमपट दिखाकर गावै ।
( घूमता है )
शिष्य ।—रावल जी ! ड्योढी के भीतर न जाना ।
दूत ।— अरे ब्राह्मण ! यह किस का घर हे ?
शिष्य ।—हम लोगों के परम प्रसिद्ध गुरु चाणक्य जी का ।
१५ दूत ।— ( हँस कर ) अरे ब्राह्मण, तब तो यह मेरे गुरुभाई ही का घर है, मुझे भीतर जाने दे, मै उस को धर्मोपदेश करू गा ।
शिष्य ।—( क्रोध से ) छि मूर्ख ! क्या तू गुरुजी से भी धर्म विशेष जानता है ?
२० दूत ।—अरे ब्राह्मण ! क्रोध मत कर, सभी सब कुछ नही जानते, कुछ तेरा गुरु जानता है, कुछ मेरे से लोग जानते ह ।
शिष्य ।—(क्रोध से ) मूर्ख ! क्या तेरे कहने से गुरु जी की सर्वज्ञता उड जायगी ?
दूत ।—भला ब्राह्मण ! जो तेरा गुरु सब जानता ह तो बतलावे
२५ कि चन्द्र किस को नही अच्छा लगता ?
* उस काल में एक चाल के फकीर जम का चित्र दिखला कर संसार की अनित्यता के गीत गाकर भीख मागते थे ।