भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 173 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 35

४० मुद्राराक्षस !

शिष्य ।—( आकर ) आज्ञा, गुरुजी ?
चाणक्य ।- बेटा ! कलम, दावात, कागज तो लाओ ।
शिष्य ।—जो आज्ञा, ( बाहर जाकर ले आता है ) गुरुजी !
ले आया ।
५ चाणक्य ।—(लेकर आप ही आप ) क्या लिखू ? इसी पत्र से
राक्षस को जीतना है।

( प्रतिहारी आता है )

प्रतिहारी ।—जय हो महाराज की, जय हो !
चाणक्य ।—(हर्ष से आप ही आप ) वाह वाह ! कैसा सगुन
१० हुआ कि कार्यारम्भ ही में जय शब्द सुनाई पडा ।
( प्रकाश ) कहो, शोणोत्तरा, क्यों आयी हो ?
प्र० ।—महाराज ! राजा चन्द्रगुप्त ने प्रणाम कहा है और पूछा
है कि मै पर्व्वतेश्वर की क्रिया किया चाहता हूं इस से
आप की आज्ञा हो तो उन के पहिरे आभरणों को
१५ पण्डित ब्राह्मणों को दूं ।
चाणक्य ।—( हर्ष से आप ही आप ) वाह चन्द्रगुप्त वाह,
क्यों न हो, मेरे जी की बात सोच कर संदेशा कहला भेजा
है ( प्रकाश ) शोणोत्तरा ! चन्द्रगुप्त से कहो कि “वाह !
बेटा वाह ! क्यों न हो, बहुत अच्छा विचार किया ! तुम
२० व्यवहार में बड़े ही चतुर हो, इस से जो सोचा है सो
करो पर पर्व्वतेश्वर के पहिरे हुए आभरण गुणवान्
ब्राह्मणों को देने चाहिए, इस से ब्राह्मण मै चुन के
भेजूंगा ।”
प्र० ।-- जो आज्ञा महाराज ! ( जाता है ) ।
२५ चाणक्य ।—शार्ङ्गरव ! विश्वावसु आदि तीनों भाइयों से
कहो कि जाकर चन्द्रगुप्त से आभरण ले कर मुझ से
मिलें ।

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद) · पृष्ठ 35, कुल 173 में से · BharatKosha