मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम अङ्क । ४१
शिष्य ।—जो आज्ञा ( जाता है ) ।
चाणक्य ।—( आप ही आप ) पोड़े तो यह लिखे पर पहिले क्या लिखे ( सोच कर ) अहा ! दूतों के मुख से ज्ञात हुआ है कि उस म्लेच्छराज-सेना मे से प्रधान पाच राजा परम भक्ति से राक्षस की सेवा करते है । ५
प्रथम चित्रवर्मा कुलूत को राजा भारी ।
मलयदेशपति सिहनाद दूजो बलधारी ॥
तीजो पुस्करनयन अहै कश्मीर देश को ।
सिन्धुसेन पुनि सिन्धु नृपति अति उग्र भेष को ॥
मेघाक्ष पाचवों प्रबल अति, बहु हय जुत पारस नृपति । १०
अब चित्रगुप्त इन नाम कों मेटहि हम जब लिखहि हति* ॥
( कुछ सोच कर ) अथवा न लिखू अभी सब बात योंही रहै ( प्रकाश ) शारगरव २ !
शिष्य ।—( आकर ) आज्ञा गुरुजी !
चाणक्य ।—बेटा ! वैदिक लोग कितना भी अच्छा लिखे तो १५
भी उनके अक्षर अच्छे नही होते, इस से सिद्धार्थक से कहो ( कान मे कहकर ) कि वह शकटदास के पास जाकर यह सब बात यों लिखवाकर और “किसी का लिखा कुछ कोई आप ही बाचे” यह सरनामे पर नाम बिना लिखवा कर हमारे पास आवे और शकटदास से २०
यह न कहे कि चाणक्य ने लिखवाया है ।
शिष्य ।—जो आज्ञा ( जाता है ) ।
चाणक्य ।—( आप ही आप ) अहा ! मलयकेतु को तो जीत लिया ।
* अर्थात अब जब हम इनका नाम लिखते हैं तो निश्चय ये सब मरेंगे । इस से अब चित्रगुप्त अपने खाते से इनका नाम काट दें, न ये जीने रहैंग न चित्रगुप्त को लेखा रखना पड़ेगा ।