भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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५४ मुद्राराक्षस—

नाश करने को भी जीवसिद्धि इत्यादि सुहृद नियुक्त ही है।
सो अब तो—
बिष वृक्ष, अहिसुत, सिंहपोत समान जा दुखरास कों।
नृपनन्द निजसुत जानि पाल्यो, सकुल निज असु नाश कों ॥
५ ता चन्द्रगुप्तहि बुद्धि सर मम तुरत मारि गिराइहै।
जो दुष्ट दैव न कवच बनिकै असह आड़े आइहै ॥
( कञ्चुकी आता है )
कञ्चुकी ।—( आप ही आप )
नृपनन्द काम समान चानक नीति जरजर जर भयो।
१० पुनि धर्म्म सम पुर देह सों नृप चन्द्र क्रम सों बढ़ि लयो ॥
अवकास लहि तोह लोभ राक्षस जदपि जीतन जाइहै।
पै सिथिल बल ने नाहि कोउ बिधि चन्द्र पै जय पाइहै ॥
(देखकर) यह मन्त्री राक्षस है ( आगे बढ़ कर ) मन्त्री !
आप का कल्याण हो।
१५ राक्षस ।—जाजलक ! प्रणाम करता हू। अरे प्रियम्बदक !
आसन ला।
प्रियम्बदक । (आसन ला कर) यह आसन है, आप बैठें।
कञ्चुकी ।—(बैठकर) मन्त्री, कुमार मलयकेतु ने आप को यह
कहा है कि “आप ने बहुत दिनों से अपने शरीर का सब
२० शृङ्गार छोड़ दिया है इस से मुझे बड़ा दुख होता है।
यद्यपि आप को अपने स्वामी के गुण नहीं भूलते और
उन के वियोग के दुख मे यह सब कुछ नहीं अच्छा
लगता तथापि मेरे कहने से आप इन को पहिरें।”
(आभरण दिखाता है) मन्त्री ! ये आभरण कुमार ने अपने
अङ्ग से उतार कर भेजे है, आप इन्हें धारण करें।
२५ राक्षस ।—जाजलक ! कुमार से कह दो कि तुम्हारे गुणों के
आगे मैं स्वामी के गुण भूल गया। पर—