मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 173 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अङ्क। ५५
इन दुष्ट बैरिन सों दुखी निज अंग, नाहि संवारि हौ।
भूषन बसन सिगार तब लौं, हौ न तन कछु धारिहौ ॥
जब लौं न सब रिपु नासि, पाटलिपुत फेर बसाइहौ।
हे कुवर ! तुम को राज दै, सिर अचल छत्र फिराइहौ ॥ ५
कचुकी।—अमात्य ! आप जो न करो सो थोड़ा है, यह बात
कौन कठिन है ? पर कुमार की यह पहिली बिनती तो
मानने ही के योग्य है।
राक्षस।—मुझे तो जैसी कुमार की आज्ञा माननीय हे वैसी
ही तुम्हारी भी, इस से मुझे कुमार की आज्ञा मानने मे
कोई विचार नही है। १०
कचुको।—(आभूषण पहिराता है) कल्याण हो महाराज !
मेरा काम पूरा हुआ।
राक्षस।—मै प्रणाम करता हूं।
कचुकी।—मुझ को जो आज्ञा हुई थी सो मै ने पूरी की
(जाता है)। १५
राक्षस।—प्रियम्बदक ! देख तो मेरे मिलने को द्वार पर कौन
खड़ा है।
प्रियम्बदक।—जो आज्ञा (आगे बढ़कर सपेरे के पास आकर)
आप कौन है ?
सपेरा।—मै जीर्णविष नामक सपेरा हूं और राक्षस मन्त्री के २०
साम्हने मै सांप खेलना चाहता हूं। मेरी यही जीविका है।
प्रियम्बदक।—तो ठहरो, हम अमात्य से निवेदन कर लें
(राक्षस के पास जाकर) महाराज ! एक सपेरा है, वह
आप को अपना करतब दिखलाया चाहता है।
राक्षस।—(बाईं आंख का फड़कना दिखाकर, आप ही आप) २५
है, आज पहिले ही सांप दिखाई पड़े (प्रकाश) प्रिय-