मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 173 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ मुद्राराक्षस—
म्बदक ! मेरा साप देखने को जी नही चाहता सो इर कुछ देकर बिदा कर ।
**प्रियम्बदक ।—**जो आज्ञा ( सपेरे के पास जाकर ) लो, मन्त्र तुम्हारा कौतुक बिना देखे ही तुम्हे यह देते है, जाओ ।
५ **सपेरा ।—**मेरी ओर से यह बिनती करो कि मै केवल सपेरा ही नही हू किन्तु भाषा का कवि भी हू, इस से जो मन्त्र जी मेरी कविता मेरे मुख से न सुना चाहै तो यह पत्र ही दे दो पढ ले ( एक पत्र देता है ) ।
प्रियम्बदक ।—( पत्र लेकर राक्षस के पास आकर ) महाराज
१० वह सपेरा कहता है कि मै केवल सपेरा ही नही हूं, भाषा का कवि भी हू । इस से जो मन्त्री जी मेरी कविता मेरे मुख से सुनना न चाहै तो यह पत ही दे दो पढ लैं ( पत्र देता है ) ।
राक्षस ।—( पत्र पढता है )
१५ सकल कुसुम रस पान करि, मधुप रसिक सिरताज ।
जो मधु त्यागत ताहि लै, होत स्रै जगकाज ॥
( आप ही आप ) अरे ! !—“मैं कुसुमपुर का वृत्तान्त जाननेवाला आप का दूत हू ” इस दोहे से यह ध्वनि निकलती है । अह ! मै तो कामों से ऐसा घबडा रहा हूं
२० कि अपने भेजे भेदिया लोगों को भी भूल गया । अब स्मरण आया, यह तो सपेरा बना हुआ विराधगुप्त कुसुमपुर से आया है ( प्रकाश ) प्रियम्बदरू ! इस को बुलाओ, यह सुकवि है, मै भी इस की कविता सुना चाहता हू ।
२५ **प्रियम्बदक ।—**जो आज्ञा ( सपेरे के पास जाकर ) चलिए, मन्त्री जी आप को बुलाते है ।
सपेरा ।—( मन्त्री के साम्हने जाकर और देखकर आप ही आप ) अरे यही मन्त्री राक्षस है ! अहा !—