भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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द्वितीय अङ्क । २७

ले बाम बाहु लताहि राखत कण्ठ सौ खसि खसि परै ।
निमि धरे दच्छिन बाहु कोहू गोद मे बिचले गिरै ॥
जा बुद्धि के डर होइ संकित नृप हृदय कुच नहि धरै ।
अजहूं न लछ्मी चन्द्रगुप्तहि गाढ़ आलिगन करै ॥ ५

प्रकाश) मन्त्री की जय हो ।
राक्षस ।—(देख कर) अरे विराध --(सकोच से बात उड़ा-
कर) प्रियम्वदक ! मै जब तक सपों से अपना जी ब-
लाता हू तब तक सब को लेकर तू बाहर ठहर ।
प्रियम्वदक ।—जो आज्ञा ।
(बाहर जाता है) १०

राक्षस ।—मित्र विराधगुप्त ! इस आसन पर बैठो ।
विराधगुप्त ।—जो आज्ञा (बैठता है) ।
राक्षस ।—(खेद के सहित निहार कर) हा ! महाराज नन्द के
आश्रित लोगों की यह अवस्था ! (रोता है)
विराधगुप्त ।—आप कुछ शोच न करें, भगवान की कृपा से १५
शीघ्र ही वही अवस्था होगी ।
राक्षस ।—मित्र विराधगुप्त ! कहो, कुसुमपुर का वृत्तान्त
कहो ।
विराधगुप्त । महाराज ! कुसुमपुर का वृत्तान्त बहुत लम्बा
चौड़ा है, इस से जहां से आज्ञा हो वहा से कहूं । २०
राक्षस ।—मित्र ! चन्द्रगुप्त के नगर प्रवेश के पीछे मेरे भेजे
हुए विष देनेवाले लोगों ने क्या क्या किया यह सुना
चाहता हूं ।
विराधगुप्त ।—सुनिए—शक्, यवन, किरात, काम्बोज पारस,
वाह्लीकादिक देश के चाणक्य के मित्र राजों की सहायता २५
से, चन्द्रगुप्त और पर्वतेश्वर के बलरूपी समुद्र से कुसुम-
पुर चारो ओर से घिरा हुआ है ।