मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अङ्क । ६७
( राक्षस को देख कर ) यह मन्त्री राक्षस बैठे हैं। अहा
नन्द गए हू नहि तजन, प्रभुसेवा को स्वाद ।
भूमि बैठि प्रगटत मनहु , स्वामिभक्त मरजाद ॥
( पास जाकर ) मन्त्री की जय हो ।
राक्षस ।— देख कर आनन्द से ) मित्र शकटदास ! आओ, ५
मुझ से मिल लो, क्योंकि तुम दुष्ट चाणक्य के हाथ से
बच के आए हो ।
शकटदास ।—( मिलता है ) ।
राक्षस ।—( मिल कर ) यहां बैठो ।
**शकटदास ।—**जो आज्ञा ( बैठता है ) । १०
**राक्षस ।—**मित्र शकटदास ! कहो तो यह आनन्द की बात
कैसे हुई ?
शकटदास ।—(सिद्धार्थक को दिखा कर) इस प्यारे सिद्धार्थक
ने सूली देनेवाले लोगों को हटा कर मुझ को बचाया।
राक्षस ।—( आनन्द से ) वाह सिद्धार्थक ! तुम ने काम तो १५
अमूल्य किया है, पर भला ! तब भी यह जो कुछ है सो
लो ( अपने अंग से आभरण उतार कर देता है ) ।
सिद्धार्थक ।—( लेकर आप ही आप ) चाणक्य के कहने से मैं
सब करूं गा ( पैर पर गिर के प्रकाश ) महाराज ! यहां मैं
पहिले पहल आयाहूं, इस से मुझे यहां कोई नही जानता २०
कि मै उस के पास इन भूषणों को छोड़ जाऊ । इस से
आप इसी अंगूठी से इस पर मोहर कर के अपने ही पास
रक्खे, मुझे जब काम होगा ले जाऊ गा ।
**राक्षस ।—**क्या हुआ । अच्छा शकटदास ! जो यह कहता है
वह करो। २५
**शकटदास ।—**जो आज्ञा ( मोहर पर राक्षस का नाम देख कर
धीरे से ) मित्र ! यह तो तुम्हारे नाम की मोहर है ।