मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ मुद्राराक्षस ।
शकटार के जी में यह ध्यान आया कि ऐसा पक्का ब्राह्मण जो किसी प्रकार राजा से क्रुद्ध हो जाय तो उस का जड़ से नाश कर के छोड़े । यह सोच कर उस ने चाणक्य से कहा कि जो आप नगर में चल कर पाठशाला स्थापित करें तो ५ अपने को मैं बड़ा अनुगृहीत समझूं । मैं इस के बदले बेलदार लगा कर यहां की सब कुशाओं को खुदवा डालूंगा । चाणक्य इस पर सम्मत हुआ और नगर में आकर एक पाठशाला स्थापित की । बहुत से विद्यार्थी लोग पढ़ने आने लगे और पाठशाला बड़े धूमधाम से चल निकली ।
१० अब शकटार इस सोच में हुआ कि चाणक्य से राजा में किस चाल से बिगाड़ हो । एक दिन राजा के घर में श्राद्ध था उस अवसर को शकटार ने अपने मनोरथ सिद्ध होने का अच्छा समय सोच कर चाणक्य को श्राद्ध का न्यौता दे कर अपने साथ ले आया और श्राद्ध के आसन पर बिठला कर १५ चला गया । क्योंकि वह जानता था कि चाणक्य का रंग काला, आंखें लाल और दांत काले होने के कारण नन्द उस को आसन पर से उठा देगा, जिस से चाणक्य अत्यन्त क्रुद्ध हो कर उस का सर्वनाश करेगा ।
और ठीक ऐसा ही हुआ—जब राक्षस के साथ नन्द २० श्राद्धशाला में आया और एक अनिमन्त्रित ब्राह्मण को आसन पर बैठा हुआ और श्राद्ध के अयोग्य देखा तो चिढ़ कर आज्ञा दिया कि इस के बाल पकड़ कर यहां से निकाल दो । इस अपमान से ठोकर खाए हुए सर्प की भांति अत्यन्त क्रोधित हो कर शिखा खोल कर चाणक्य ने सब के सामने प्रतिज्ञा २५ की कि जब तक इस दुष्ट राजा का सत्यानाश न कर लूंगा तब तक शिखा न बांधूंगा । यह प्रतिज्ञा कर के बड़े क्रोध से राज-भवन से चला गया ।