मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपूर्व्वकथा । १३
पहिले तो किसी की अत्यन्त प्रतिष्ठा बढ़ानी ही नीतिविरुद्ध है। यदि संयोग से बढ़ जाय तो उस की बहुत सी बातों को तरह देकर टालना चाहिए, और जो कदाचित् बड़े प्रतिष्ठित मनुष्य का राजा अनादर करै तो उस की जड़ काट कर छोड़ै, फिर उस का कभी विश्वाश न करै । ५ प्राय अमीर लोग पहले तो मुसाहिब या कारिन्दों को बेतरह सिर चढ़ाते हैं, और फिर छोटी छोटी बातो पर उन की प्रतिष्ठा हीन कर देते हैं। इसी से ऐसे लोग राजाओं के प्राण के गाहक हो जाते हैं और अन्त मे नन्द की भांति उन का सर्वनाश होता है। १०
शकटार यद्यपि बन्दीखाने से छूटा और छोटा मन्त्री भी हुआ, किन्तु अपनी अप्रतिष्ठा और परिवार के नाश का शोक उस के चित्त मे सदा पहिले ही सा जागता रहा। रात दिन वह यही सोचता कि किस उपाय से ऐसे अव्यवस्थित-चित्त उद्धत राजा का नाश करके अपना बदला लें। एक दिन घोड़े १५ पर वह हवा खाने जाता था। नगर के बाहर एक स्थान पर देखता है कि एक काला सा ब्राह्मण अपनी कुटी के सामने मार्ग की कुशा उखाड़ उखाड़कर उस की जड़ मे मठा डालता जाता है। पसीने से लथपथ है, परन्तु कुछ भी शरीर की ओर ध्यान नहीं देता। चारो ओर कुशा के बड़े २ ढेर लगे हुए हैं। २० शकटार ने आश्चर्य्य से ब्राह्मण से इस श्रम का कारण पूछा। उसने कहा—"मेरा नाम विष्णुगुप्त चाणक्य है। मैं ब्रह्मचर्य्य मे नीति, वैद्यक, ज्योतिष, रसायन आदि संसार की उपयोगी सब विद्या पढ कर विवाह की इच्छा से नगर की ओर आया था, किन्तु कुश गड़ जाने से मेरे मनोरथ मे विघ्न हुआ, इस २५ से जब तक इन बाधक कुशाओं का सर्वनाश न कर लूंगा और काम न करूंगा। मठा इस वास्ते इन की जड़ मे देता हूं जिस से पृथ्वी के भीतर इन का मूल भी भस्म हो जाय।"