मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ अङ्क । २०१
राक्षस ।—अजी, पहिले तो तिथि ही नही शुद्ध है । क्षपणक ।— उपासक ! एक गुनी तिथि होत है, त्यौं चौगुन नक्षत्र । लगन होत चौतिस गुनो, यह भाखत सब पञ्ज ॥ लगन होत ह शुभ लगन, छोड़ि क्रूर ग्रह एक । जाहु चन्द्र बल देखि कै, पावहु लाभ अनेक ॥ × राक्षस ।—अजी, तुम और जोतिषियों से जा कर झगड़ो ॥ क्षपणक ।—आप ही झगड़िये, मै जाता हूं । राक्षस ।—क्या आप रूस तो नही गए ? क्षपणक ।—नही, तुम से जोतिषी नही रूसा है । १० राक्षस ।—तो कौन रूसा है ? क्षपणक ।—(आप ही आप ) भगवान्, कि तुम अपना पक्ष छोड़ कर शत्रु का पक्ष ले बैठे हो ( जाता है ) । राक्षस ।—प्रियम्वदक ! देख तो कौन समय है । प्रियम्वदक ।—जो आज्ञा ( बाहर से हो आता है ) आर्य्य ! १५ सूर्यास्त होता है ।
बुद्धि क अस्त के समय और चन्द्रगुप्त के उदय के समय जाना अच्छा है अर्थात् चाणक्य की ऐसे समय में जय होगी । लग्न अर्थात् कारण भाव में बुध चाणक्य पड़ा है इससे कतु अर्थात् मलयकेतु का उदय भी है तो भी अस्त ही होगा । अर्थात् इस युद्ध में चन्द्रगुप्त जीतेगा और मलयकेतु हारेगा । सूर अथए—इस पद से जीवसिद्धि, ने अमंगल भी किया । आश्विन पूर्णिमा तिथि, भरणी नक्षत्र, गुरुवार, मेष के चन्द्रमा मीन लग्न में उस ने यात्रा बतलायी । इस में भरणी नक्षत्र गुरुवार, पूर्णिमा तिथि यह सब दक्षिण की यात्रा में निषिद्ध हैं । फिर सूर्य्य मृत है चन्द्र जीवित है यह भी बुरा है । लग्न में मीन का बुध पड़ने से नीच का होने से बुरा है । यात्रा में नक्षत्र दक्षिण होने ही से बुरा है ।
× अर्थात् मलयकेतु का साथ छोड़ े तो तुम्हारा भला हो। वास्तव में चाणक्य के मित्र होने से जीवसिद्धि ने साहत भी उलटी दी । ज्योतिष के अनुसार अत्यन्त क्रूर वेला, क्रूर ग्रह वेध में युद्ध आरम्भ होना चाहिये । उसके विरुद्ध सौम्य समय में युद्धयात्रा कही, जिसका फल पराजय है ।