मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—विप्राणां आद्यगर्भे, क्षत्रादीनां अनादिमेगर्भे अपि जन्मर्क्षमासंलग्नादौ व्रते (सति) व्रती विद्याधिकः स्यात् ॥ ४५ ॥ जन्मनक्षत्र, जन्ममास, जन्मलग्न और जन्मतिथि में ब्राह्मण के पहले लड़के का और क्षत्रियों तथा वैश्यों के पहले को छोड़ अन्य लड़के का यज्ञोपवीत हो तो वह अधिक विद्यावाला होता है ॥ ४५ ॥ बृहस्पति का बल वटुकन्याजन्मराशेस्त्रिकोणायद्विसप्तगः । श्रेष्ठो गुरुः खषट्त्र्याद्ये पूजयान्यत्र निन्दितः ॥ ४६ ॥ अन्वयः—वटुकन्याजन्मराशेः त्रिकोणायद्विसप्तगः गुरुः श्रेष्ठः स्यात्, खषट्त्र्याद्येषु पूजया (शुभः) अन्यत्र निन्दितः स्यात् ॥ ४६ ॥ लड़के वा लड़की की जन्मराशि से नवीं, पाँचवीं, गेरहवीं, दूसरी वा सातवीं राशि में बृहस्पति शुभ; दसवीं, छठी, तीसरी वा पहली राशि में पूजा करने से शुभ और चौथी, आठवीं वा बारहवीं राशि में अशुभ होता है ॥ ४६ ॥ गुरुदोषापवाद स्वोच्चे स्वभे स्वमैत्रे वा स्वांशे वर्गोत्तमे गुरुः । रिष्फाष्टतुर्यगोऽपीष्टो नीचारिस्थः शुभोऽप्यसत् ॥ ४७ ॥ अन्वयः—गुरुः स्वोच्चे स्वभे स्वमैत्रे वा स्वांशे रिष्फाष्टतुर्यगोऽपि इष्टः स्यात् । तथा नीचारिस्थः शुभोऽपि असत् स्यात् ॥ ४७ ॥ बारहवें, आठवें वा चौथे स्थान में भी स्थित बृहस्पति यदि स्वोच्च, स्वराशि, स्वमित्रराशि, स्वनवांश वा वर्गोत्तम में हो तो शुभ हो जाता है और शुभ भी बृहस्पति यदि अपने नीच स्थान में या अपने शत्रु के स्थान में स्थित हो तो वह अशुभ हो जाता है ॥ ४७ ॥ यज्ञोपवीत में निषिद्ध समय कृष्णे प्रदोषेऽनध्याये शनौ निश्यपराह्नके । प्राक्संध्यागर्जिते नेष्टो व्रतबन्धो गलग्रहे ॥ ४८ ॥ अन्वयः—कृष्णे, प्रदोषे, अनध्याये, शनौ, निशि, अपराह्नके, प्राक्संध्यागर्जिते तथा गलग्रहे व्रतबन्धः नेष्टः स्यात् ॥ ४८ ॥