भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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संस्कारप्रकरण ९५ पञ्चमी तक को छोड़ कृष्णपक्ष, प्रदोष*, अनध्याय†, शनैश्चर का दिन, रात्रि और दोपहर के बाद का समय, जिस दिन प्रातःकाल मेघ गर्जे वह दिन और गलग्रह‡, इनमें यज्ञोपवीत शुभ नहीं होता ॥ ४८ ॥ सूर्यादि ग्रहों के नवांश में यज्ञोपवीत होने का फल क्रूरो जडो भवेत्पापः पटुः षट्कर्मकृद्वटुः । यज्ञार्थभाक् तथा मूर्खो रव्याद्यंशे तनौ क्रमात् ॥ ४९ ॥ अन्वयः—रव्याद्यंशे तनौ सति वटुः क्रमात्, क्रूरः, जडः, पापः, पटुः, षटकर्मकृत्, यज्ञार्थभाक्, तथा मूर्खः स्यात् ॥ ४९ ॥ सूर्य के नवांश+ में यज्ञोपवीत करने से वह बालक क्रूर अर्थात् निर्दय, चन्द्रमा के नवांश में करने से जड़ अर्थात् विचाररहित, मङ्गल के नवांश में पापी, बुध के नवांश में पटु अर्थात् चतुर, बृहस्पति के नवांश में यज्ञ करना- कराना, दान लेना-देना, पढ़ना-पढ़ाना, ये छः कर्म करनेवाला, शुक्र के नवांश में यज्ञ करनेवाला और धनी तथा शनैश्चर के नवांश में यज्ञोपवीत करने से मूर्ख होता है । इसलिए लग्न में शुभग्रह का नवांश हो तब यज्ञोपवीत उत्तम होता है ॥ ४९ ॥ यज्ञोपवीत में चन्द्रनवांश का फल विद्यानिरतः शुभराशिलवे पापांशगते हि दरिद्रतरः । चन्द्रे स्वलवे बहुदुःखयुतः कर्णादितिभे धनवान्स्वलवे ॥ ५० ॥ अन्वयः—शुभराशिलवे चन्द्रे व्रती विद्यानिरतः स्यात् । पापांशगते दरिद्रतरः स्यात् । स्वलवे चन्द्रे बहुदुःखयुतः स्यात् । स्वलवे चन्द्रे कर्णादितिभे धनवान् भवति ॥ ५० ॥ यज्ञोपवीत में यदि चन्द्रमा शुभराशि के नवांश में स्थित हो तो व्रती अर्थात् जिसका यज्ञोपवीत करना है वह बालक सदा विद्या में रुचि रखनेवाला और पापराशि के नवांश में स्थित हो तो अतिशय दरिद्र तथा अपनी राशि के नवांश में अर्थात् कर्कराशि के नवांश में स्थित हो तो बहुत

  • इसी प्रकरण के ५५ श्लोक में कहेंगे । † इसी प्रकरण के ५४ श्लोक में कहेंगे । ‡ चौथि, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पौर्णमासी, परीबा और कृष्णपक्ष में अमावास्या ये गलग्रहसंज्ञक तिथियाँ हैं ।
  • नवांशों का विचार विवाहप्रकरण में कहेंगे ।