भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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९६ मुहूर्तचिन्तामणि दुःखों से संयुक्त होता है। यदि यज्ञोपवीतकाल में चन्द्रमा कर्कराशि के नवांश में हो और श्रवण नक्षत्र या पुनर्वसु नक्षत्र हो तो वह बालक धनवान् होता है ॥ ५० ॥ केन्द्रस्थित सूर्यादि ग्रहों का फल राजसेवी वैश्यवृत्तिः शस्त्रवृत्तिश्च पाठकः । प्राज्ञोऽर्थवान्म्लेच्छसेवी केन्द्रे सूर्यादिखेचरैः ॥ ५१ ॥ अन्वयः—केन्द्रे सूर्यादिखेचरैः व्रती क्रमेण राजसेवी, वैश्यवृत्तिः, शस्त्रवृत्तिः, पाठकः, प्राज्ञः, अर्थवान्, च म्लेच्छसेवी भवति ॥ ५१ ॥ लग्न, चौथे, सातवें और दशवें स्थान की केन्द्र संज्ञा है। सूर्य केन्द्र में स्थित हो तो जिसका यज्ञोपवीत किया जाय वह राजा का सेवक, चन्द्रमा केन्द्र में हो तो वैश्यवृत्ति करनेवाला, मङ्गल केन्द्र में हो तो शस्त्रजीवी, बुध केन्द्र में हो तो अध्यापक, बृहस्पति केन्द्र में हो तो पण्डित, शुक्र केन्द्र में हो तो धनवान् और शनैश्चर केन्द्र में हो तो म्लेच्छों का सेवक होता है ॥ ५१ ॥ यज्ञोपवीतकाल में संयुक्त ग्रहों का फल शुक्रे जीवे तथा चन्द्रे सूर्यभौमार्किसंयुते । निर्गुणः क्रूरचेष्टः स्यान्निर्घृणः सद्युते पटुः ॥ ५२ ॥ अन्वयः—शुक्रे, जीवे तथा चन्द्रे सूर्यभौमार्किसंयुते व्रती क्रमेण निर्गुणः, क्रूरचेष्टः तथा निर्घृणः स्यात् । सद्युते पटुः स्यात् ॥ ५२ ॥ यदि यज्ञोपवीतकाल में शुक्र, बृहस्पति व चन्द्रमा, इनमें से किसी ग्रह के साथ सूर्य हो तो बालक निर्गुण, मङ्गल हो तो निर्दय और शनैश्चर हो तो निर्लज्ज होता है। शुभ ग्रहों का संयोग होने से सब विद्याओं में निपुण होता है ॥ ५२ ॥ यज्ञोपवीत में चन्द्रवश से शुभाशुभ योग विधौ सितांशगे सिते त्रिकोणगे तनौ गुरौ । समस्तवेदविद् व्रती यमांशगेऽतिनिर्घृणः ॥ ५३ ॥ अन्वयः—विधौ सितांशगे, सिते त्रिकोणगे, गुरौ तनौ, व्रती समस्तवेदविद् भवति । यमांशगे अतिनिर्घृणः स्यात् ॥ ५३ ॥